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Wednesday, 14 September 2022

हिंदी दिवस।

मुझे तीन भाषाएं बहुत पसंद है। हिंदी,अंग्रेज़ी और उर्दू। वैसे अंग्रेज़ी भाषा और उर्दू भाषा की वर्णमाला से बाहर नहीं आ पा रहा हूँ लेकिन हिंदी भाषा इन दो भाषाओं से थोड़ी बेहतर जानता हूँ। फ़िलहाल ठाकुर जी की तीसरी कक्षा की किताब से ं(अनुस्वार) ँ(अनुनासिक) और ऑ(आगत स्वर) फिर से सीखने को मिले। मैं इन नासिक्य व्यंजनों का प्रयोग तो करना जानता था लेकिन इन्हें क्या कहते हैं, ये मैं भूल गया था। मैं भी आम बोलचाल की भाषा में बिंदु, चंद्रबिंदु ही कहता था।

मेरा मानना है कि जिस इंसान को अंग्रेज़ी, हिंदी और उर्दू में महारथ हासिल है, वो Confidence, अच्छे व्यवहार और तलफ़्फ़ुज़ की जीती जागती मिसाल है।


हिंदी दिवस की बहुत-बहुत शुभकामनाएं। 💐


~ मनीष शर्मा

Sunday, 21 August 2022

ठाकुर जी के कुछ मासूम सवाल।

दो सप्ताह पहले मैं और ठाकुर जी पलंग पर पसरकर घर पर सिनेमा देख रहे थे। शायद घर पर पसरकर सिनेमा देखने की ही उपज रहे होंगे आधुनिक सिनेमा।


यथासंभव है कि पश्चिमी देशों में थोड़े दिन बाद सिनेमा से कुर्सियाँ गायब हो जाये और पलंग ही दिखाई दे। वैसे भारत की बढ़ती आबादी अधिकतर सिनेमा में पलंग नहीं लगने देगी।


ख़ैर हम जो फ़िल्म देख रहे थे उसका नाम था "भाग मिल्खा भाग"। मिल्खा सिंह का जुनून उन्हें सर्वश्रेष्ठ धावक बना देता है। मैं फ़िल्म देखने के साथ-साथ ठाकुर जी के अवचेतन मन में मिल्खा सिंह के जुनून को भरने की कोशिश कर रहा था। मैं ठाकुर जी को समझा रहा था कि मिल्खा सिंह के पास वे सुविधायें नहीं थीं, जो आज कल के बच्चों के पास है, आपके पास है। आप भी मेहनत करके मिल्खा सिंह जैसे बनो। मिल्खा सिंह जैसे मतलब, जो आपको पसंद हो, वो काम करो। साथ ही ख़्याल रहे कि वो पसंद का काम क़ामयाबी दे, ख़ुशी दे। ऐसे किसी लक्ष्य को हासिल करने के पीछे लग जाओ जिससे ज़िंदगी लुत्फ़ देने लगे।


लेकिन एकाएक एक दृश्य दिखाई देता है जिसमें मिल्खा सिंह क़ामयाबी के शिखर पर पहुँच जाने के बाद एक दौड़ से पहले मदिरा का सेवन करते हुए नज़र आते हैं। 


ठाकुर जी का मासूम सा सवाल, पापा जी आप कहते हो कि शराब बुरी चीज़ है और किसी भी बुरी आदतों के साथ बड़ा आदमी नहीं बना जा सकता तो फिर क़ामयाब होने से पहले इनका लक्ष्य सिर्फ़ मैदान में जीत रहा लेकिन क़ामयाबी हासिल करने के बाद ये शराब क्यों पीने लगे ? मैं अपने ज़वाब को चालाकी से हेरफ़ेर (manipulate) करने की कोशिश कर रहा था। लेकिन मैं सवालों के ज़वाब को हेराफ़ेरी करने में कुशल नहीं हूँ तो ज़्यादा देर तक ठाकुर जी ने मुझे जवाबों को हेरफ़ेर नहीं करने दिया इसके तुरंत बाद ठाकुर जी को बातों में उलझाने से बेहतर मुझे सही-सही ये बताना सहज लगा कि शराब बहुत बुरी चीज़ है इसके सेवन से आदमी को कोई फ़ायदा नहीं होता, बल्कि नुक़सान होता है। जैसे सेहत का नुक़सान, पैसों का नुक़सान। अब दूसरा सवाल ठाकुर जी का, कि अगर ये नुक़सान हैं तो फिर मेरे ननिहाल गुजरात में एक भी शराब की दुकान नहीं है लेकिन राजस्थान में आते ही हर दो से तीन किलोमीटर की दूरी पर अंग्रेज़ी शराब/देशी शराब की दुकान नज़र आती है और उन पर लोगों की भीड़ दिखाई पड़ती है ? यहाँ तक कि कोरोना के वक़्त लॉकडाऊन में भी शराब की दुकानों पर भारी भीड़ दिखाई दी थी ?


ज़वाब में मैंने ठाकुर जी से कहा, क्या मुझे कभी शराब पीते देखा है ? चाय पीते देखा है ? सुपारी या गुटखा खाते देखा है ? ठाकुर जी जवाब में, नहीं पापा जी। तो फिर ये मान लो कि ये सब फ़िलहाल के लिए बहुत बुरी चीजें हैं। मैं आपके बहुत सारे सवालों के ज़वाब आपके अठारह वर्ष पूरे होने पर दूँगा। आपका हर एक सवाल मुझ पर ऋण है, ठाकुर जी।


ठाकुर जी, आप ऐसे तमाम सवालों के ज़वाब मुझसे पूछना, ख़ुद से पूछना, गुरु से पूछना या फिर किताबों में ढूँढना। बस, दुनिया से मत पूछना। क्योंकि दुनिया सारे सवालों के ज़वाब हेरफ़ेर (manipulate) करके देगी। क्योंकि दुनिया दो भागों में बटी है पहले वाले भाग के लोग आपको आसानी से नहीं मिलेंगे और मिल भी जायेंगे तो अहंकारवश कुछ नहीं बताएंगे। और दूसरे भाग वाले लोग आपको सहजता से मिलेंगे, मिलकर पथभ्रष्ट कर देने की पूरी संभावना बनी रहेगी। और किसी पर यक़ीन करना भी हो तो क़िताबों और अपने गुरुओं पर करना, वे आपको हमेशा आईना दिखायेंगे। क़िताबों में दुनिया के तमाम बेहतरीन लोग छपते हैं। पाठ्यक्रम की क़िताबों के बाद मैं आपके हाथ में वित्तीय आज़ादी हासिल किए जाने की क़िताबें देखना चाहूँगा।


मिल्खा सिंह पर बनी फ़िल्म कुछ और सवाल छोड़ती है। फ़िल्म में मिल्खा सिंह एक विदेशी लड़की के प्रेम में पड़ जाते है, प्रेम में पड़ने के बाद उनकी दौड़ का प्रदर्शन प्रभावित होता है वे लक्ष्य से भटक जाते हैं। लेकिन ख़ुद को संभालते हुए वापिस लक्ष्य प्राप्ति की तरफ़ अग्रसर हो जाते हैं। वैसे अकस्मात मिलने वाली चीज़ें मन को लुभाती है, साथ ही वे चीज़ें भटकाव भी लाती है। मिल्खा सिंह के प्रेमवश भटकाव के बारे में भी ठाकुर जी ने सवाल किए। मैंने ज़वाब में कहा हमारे लक्ष्य के बीच जो भी आता है वो हमारा दुश्मन होता है। इसका मतलब ये नहीं कि जीवन में प्रेम ना हो। जीवन का अर्थ ही प्रेम है।


भाग मिल्खा भाग अच्छी फ़िल्म है। मिल्खा सिंह का संघर्ष आदमी में जोश और जुनून भरता है।


~ मनीष शर्मा 


Tuesday, 12 July 2022

ना हथाई, ना बंतळ।

ना हथाई, ना बंतळ।


ये ज़रूरी नहीं कि हर वो आदमी जो चाय की थड़ी या पान की दुकान पर मिले, वो चाय पीता हो, पान सुपारी खाता हो या सिगरेट फूँकता हो।


मैंने कभी किसी चाय की थड़ी या पान की दुकान पर बैठकर चाय पीते हुए या पान सुपारी खाते हुए गपशप (ठेठ मारवाड़ी में दो शब्द हैं हथाई या बंतळ) नहीं की।


इन दिनों ठाकुर जी जिस स्कूल में जा रहे है वो शहर से थोड़ी दूर है। स्कूल, स्कूल बस में जाना पड़ता है। ठाकुर जी को स्कूल बस में बैठाने का ठिकाना, एक दवाई की दुकान के बाहर है। लेकिन स्कूल से वापसी एक चाय की थड़ी के बाहर होती है। जहाँ थोड़ी धूप, थोड़ी छाँव मुझ पर पड़ती रहती है।


मैं ठाकुर जी की स्कूल बस आने से ठीक दस मिनट पहले उस चाय की थड़ी के बाहर खड़ा होकर ठाकुर जी के स्कूल से लौट आने का इंतज़ार करता हूँ। तब तक वहाँ से गुज़रने वाला मेरी जान पहचान का हर एक शक़्स मुझसे पूछता है, यहाँ कैसे खड़े हो ? पूछने वालों की तादाद इसलिए भी ज़्यादा होती है कि मैं जिस सरकारी अस्पताल में नौकरी करता हूँ वहाँ से ज़्यादा दूरी नहीं है चाय की थड़ी की। लोगों का पूछना लाज़मी भी है क्योंकि इससे पहले मुझे कभी किसी आदमी ने चाय की थड़ी या पान की दुकान पर नहीं देखा।


मेरी ज़िंदगी का अब बस एक ही मक़सद है आप अच्छे और क़ाबिल इंसान बनो ठाकुर जी। ख़ूब पढ़ो, बड़े आदमी बनो। मैं आपके लिए ख़ुद को फ़ना करने के लिए तैयार हूँ।



Thursday, 12 May 2022

प्रेम शाश्वत रहेगा...

मानव के चरित्र का चित्रण केवल मध्यम वर्गीय लोग ही करते हैं और किसी की निजी ज़िंदगी में दख़ल भी ज़्यादातर मध्यम वर्गीय लोग ही देते हैं। उच्च वर्गीय लोगों की नज़र आर्थिक शिखर पर होती है, वे हमेशा, वो काम करते हैं जो उन्हें ख़ुशी दे और सफ़ल बनाये। साथ ही वे केवल अपना जीवन जीते हैं, किसी और का नहीं। इन्हें इससे भी कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि कौन इनके बारे में क्या सोचता है।

वहीं बात की जाए अगर निम्न वर्ग की, तो वे अपनी ज़रूरतों को पूरा करने में इतना व्यस्त रहते हैं कि कब दिन डूबे, कब रात ढले इसका इन्हें आभास नहीं।

ज़्यादातर लोग मध्यमवर्गीय सोच वाले हैं। ये वे लोग हैं जो आदमी की परिधि और दायरे तय करते हैं। ये वर्ग आदमी को ये सिखाता हैं कि ख़ुद की ख़ुशी का गला घोंटो और सबके बारे में सोचो और वो सब जिनके बारे में सोचना है, वे, वे लोग है जो दूसरों की ज़िंदगी में आग लगा के तमाशा देखते हैं और ख़ुद वो करते हैं जो उन्हें ठीक लगता है।

मैं हमेशा से देखता आया हूँ कि किसी भी व्यक्ति को अगर नीचा दिखाना है तो उसके चरित्र पर कीचड़ उछाल दो। यहाँ व्यक्ति से तात्पर्य स्त्री और पुरूष दोनों समझा जावें। इस कीचड़ के दाग इतने गहरे होते हैं कि आने वाली पीढ़ियाँ भी इन दागों को नहीं मिटा पाती।

आदमी ने कितनी आसानी से (जैविक) बायोलॉजिकल ज़रूरत को चरित्र से जोड़ दिया और उसे हथियार की तरह इस्तेमाल करने लगा। एक ऐसा हथियार जो आदमी को हर रोज़ मारता है। इससे बड़ा हथियार ना कभी बना है और ना ही कभी बनेगा।

एक दिन वैसे भी सभी को मिट्टी हो जाना हैं। ना धर्म की दीवारें, ना मज़हब का पर्दा, ना कोई सामाजिक परिधि। हर बेड़ी से मुक्त। लेकिन उस मुक्ति से पहले की जकड़न। उफ़्फ़...।

वैसे हमारे लिए मायने ये रखता है कि आदमी अपने जीवन में कितना ख़ुश रहता है, ना कि ये, कि लोगों ने हमारे बारे में क्या राय बना रखी है। इसलिए जियें और जीने दें, ठीक वैसे जैसा आदमी जीना चाहता है। यहाँ आदमी के चाहने का मतलब किसी को शारीरिक या मानसिक क्षति ना पहुँचे, वैसे। क्यों कि आदमी की चाहत के कईं रूप हैं। आजकल आदमी ने प्रेम की बजाय नफ़रत को चुन लिया है। हम रहेंगे या नहीं रहेंगे लेकिन प्रेम शाश्वत रहेगा...

~ मनीष शर्मा


Sunday, 27 March 2022

ना मैं सही, ना तू ग़लत, छोड़ तकरार, कर उल्फ़त।

सब कारगुज़ारी ज़माने की

ना मैं सही, ना तू ग़लत

क्यों उलझें, हम इक दूजे से

छोड़ तकरार, कर उल्फ़त।


कुछ लोग अपनी आज़ादी के लिए लड़ रहे है, आज़ादी, आज़ादी ठीक वैसी, जैसे आदमी जीना चाहता है। स्वछंद जीवन, बिना किसी हस्तक्षेप के। ना कोई सवाल, ना ज़वाब।


आज़ादी का मतलब ये कतई नहीं कि ज़मीन या सरहदें बांटी जाएं या हिंसा फ़ैलाई जाए। आज़ादी का मतलब यहाँ ये समझा जाए कि प्रेम और बस प्रेम में ही डूबे रहने वाले आदमी को प्रेम से बाहर हिंसा या नफ़रत की दुनिया में ना धकेला जाए। उसे वो करने दिया जाए जिससे उसे ख़ुशी मिले। एक बार फिर से कहना चाहूँगा कि ख़ुशी का मतलब हिंसा और नफ़रत के बाहर की दुनिया, जिसमें किसी को, किसी से, किसी तरह का कोई शारिरिक या मानसिक नुक़सान ना पहुँचे या जिसमें किसी का कोई अहित ना छुपा हो।


दरअसल दकियानूसी समाज की जड़ों का कोई छोर नज़र नहीं आता। इन जड़ों को जितना उखाड़ना चाहते हैं, वे उतनी ही ज़्यादा फ़ैलती है, पैरों से साँप की तरह लिपट कर आहिस्ता आहिस्ता डसती रहती है और ज़हर भीतर उतरता रहता है।


कुछ लोग हिम्मत करके गमबूट पहन कर इसी समाज में सिर उठाने की हिम्मत करते रहते है लेकिन उन्हें कुचल दिया जाता है। इन्हीं में से कुछ लोग इन जड़ों के जंजाल से मुक्त होकर एक अलग समाज का हिस्सा बन जाते है। वो समाज ठीक वैसा होता है जैसे व्यक्ति जीना चाहता है, वो समाज उसे आज़ादी के साथ स्वीकार करता है। लेकिन बहुत कम लोग ही उस समाज का हिस्सा बन पाते हैं। क्यों प्रत्येक समाज, व्यक्ति को वैसे स्वीकार नहीं कर पाता जैसे वो जीना चाहता है। क्यों व्यक्ति को अपने अस्तित्व की लड़ाई पहले ख़ुद से और बाद में समाज से लड़नी पड़ रही है ? क्यों उन विषयों पर लगातार चर्चा की जाती है जिन पर वास्तविकता में चर्चा की आवश्यकता है ही नहीं और जिन पर चर्चा की आवश्यकता है दरअसल में अब मुद्दे होकर भी मुद्दे नहीं रह गए हैं, मतलब कि चर्चा योग्य मुद्दों को नज़रअंदाज़ किया जा रहा है।


प्रेम में डूबने वाले आदमी को प्रेम में डूबा रहने दें। समाज उसके जीवन में नफ़रत और हिंसा का ज़हर ना घोलें। जियें और जीने दें।


जो बाहर देख रहा हूँ, वही लिख रहा हूँ। जिन पर लिख रहा हूँ वे बरसों से ख़ामोश है, ख़ामोश ही रहेंगे। क्योंकि हर एक शब्द की कोई ना कोई क़ीमत चुकानी होती है और वे क़ीमत चुकाने को तैयार नहीं। घुट घुटकर मरना उन्हें मंज़ूर है लेकिन बग़ावत नहीं। जागें।


~ मनीष शर्मा

Thursday, 24 February 2022

जंग ख़त्म करो रूस, यूक्रेन।

बस, ये दुनिया यहीं ख़त्म हो जाये तो बेहतर। क्या फ़ायदा ऐसी दुनिया में जीने का जहाँ प्रेम का हास हो रहा है और नफ़रत फ़ल फूल रही है। क्यों हम आने वाली नस्लों को बारूद के ढेर पर मरने के लिए छोड़ रहे हैं। आदमी, आदमी का दुश्मन बन रहा है और एक देश दूसरे देश से अधिक शक्तिशाली होने के चक्कर में कमज़ोर देश को अपने पैरों तले कुचल रहा है।


हम सब भीड़ हैं, ऐसी भीड़ जो हमेशा से तमाशा देखती आयी है, दो लोगों की लड़ाई का तमाशा। जिस लड़ाई में कमज़ोर ज़ख्मी होता हैं। इन दोनों लोगों की लड़ाई को छुड़वाने का प्रयास करने पर इनकी लड़ाई बीच में ख़त्म हो जाती है लेकिन जो इस लड़ाई में ताक़तवर है वो हमारा दुश्मन बन जाता है। बस यही तमाशा विश्व के सभी देश इस वक़्त देख रहे हैं, कोई बीच बचाव नहीं करेगा। कोई मानवाधिकार आयोग सामने नहीं आएगा। बस सारे देश दूर से निंदा करेंगे।


मेरी बातों में विरोधाभास भी है, कभी कभी मुझे लगता है 'समरथ को नहिं दोष गुसाईं' कहावत कितनी सार्थक है। मैं हमेशा से देखता आ रहा हूँ कि ताक़तवर लोगों की ग़लत बात को भी लोगों ने सही ठहराया है आगे भी ठहराते रहेंगे। कमज़ोर हमेशा कुचला जाता आया है और कुचला जाता रहेगा।


मैं ये नहीं कह रहा है रूस ग़लत है या यूक्रेन। मैं बस ये कह रहा हूँ कि दुनिया में जीना है तो आदमी को इतना ताक़तवर होना चाहिए कि कोई नज़र उठाने से पहले अंजाम के बारे में सौ बार सोचे।


वैसे हम लोग ख़ामख़ा अपने अहंकार का बोझ लिए घूम रहे हैं। अहंकार तो वीटो वालों को होना चाहिये। हमारे पास सामान क्या है ?


वैसे जंग ख़त्म करो, आपस में प्रेम करो यूक्रेन और रूस। नहीं तो दो देशों या दो लोगों की लड़ाई में कभी कभार कोई तीसरा आग में घी डालने का काम करता है और वो तीसरा मौके की तलाश में है।


~ मनीष शर्मा


Monday, 17 May 2021

हम कूटनीतिज्ञ हैं। We are diplomatic.

हम सभी कूटनीतिज्ञ हैं। कब, कहाँ और कैसे अपनी ज़ुबाँ से फिर जायेंगे, पता नहीं। किसी को कोई फ़र्क नहीं पड़ता, कोई जिये या तिल तिल मरे। अगर फ़र्क पड़ता तो पूँजीवाद, साम्यवाद को अपने पैरों तले कभी नहीं रौंदता।

देश हो या आदमी सभी की एक ही सोच है, व्यापार फलता फूलता रहना चाहिए। आदमी का क्या है, आयेंगे, जायेंगे। किसी और का दर्द हमें थोड़ी देर के लिए तकलीफ़ दे सकता है लेकिन उस दर्द से होने वाली तकलीफ़ भोगने वाले और उसके परिवार को जीवनपर्यंत उस दर्द से गुज़रना होता है या फिर यूँ कहें कि घुट घुटकर मरना होता है।

किसी भी हिंसा में बहुत सारे लोग मरते हैं। लेकिन मरने वालों के परिवारों के अलावा किसी को कोई फ़र्क नहीं पड़ता। बड़ी आबादी वाले देशों में आदमी की औक़ात जनगणना के आँकड़ों से ज़्यादा नहीं है। जहाँ आबादी कम है वे ज़रूर अपने जनसंसाधन को बचाना चाहते हैं। अधिक जनसंख्या वाले देश भगवान भरोसे जीते हैं। बायें हाथ की तर्जनी उँगली पर स्याही लगवाकर जनता जिन्हें चुनती हैं। शिखर पर पहुँच जाने के बाद वे उसी स्याही से जनता के मुँह पर कालिख़ पोतते हैं। मदद के नाम पर उनसे आश्वासन मिलते हैं, मदद नहीं।

काश, जिस तरह हमारे देश में दुर्लभ प्राणियों को बचाया जाता रहा है। उसी तरह से मानव भी दुर्लभ प्रजातियों में होता तो बेहतर होता।

अब मुद्दा ये नहीं है कि इज़रायल और फिलिस्तीन में से कौन सही है और कौन ग़लत। मुद्दा ये है कि मानवता मर चुकी है। दो दिन पहले हम सभी हर्षोल्लास से त्योंहार मना रहे थे। लेकिन वहीं एक देश बारूद के ढेर पे सुलग रहा था, सिसक रहा था, अब भी सुलग रहा है, सिसक रहा है। लेकिन हमें कोई फ़र्क नहीं पड़ा, ना ही पड़ेगा। क्यों कि उस हिंसा के शिकार हम नहीं हैं।

वैसे एक घर सुलगता है किसी को कोई फ़र्क नहीं पड़ता लेकिन इस बार कोरोना ने पूरी दुनिया को सुलगाया है। इसीलिए थोड़ा बहुत बहुत फ़र्क सभी को ज़रूर पड़ रहा है। आहिस्ता आहिस्ता ये फ़र्क भी असर छोड़ देगा।

प्रेम की बात अब गीतों किस्सों और कहानियों में अच्छी लगती है। वास्तविकता में तो हम सभी ने नफ़रतों को गले से लगा लिया है। ख़ैर...

ये दुनिया अब मिट भी जाये तो क्या है, वैसे भी दोज़ख़ बना दिया है हमने इस दुनिया को।


~ मनीष शर्मा



Thursday, 27 August 2020

बुरे लोग एक सबक की तरह होते हैं।

बुरे लोग एक सबक की तरह होते हैं। इनके सबक ज़िंदगी भर याद रखे जाने चाहिए, क्यों कि हर क़दम हमारा वास्ता ज़्यादातर ऐसे ही लोगों से पड़ता आया है और पड़ता रहेगा। यही वे लोग हैं, जिनकी वज़ह से हम सही और ग़लत के बीच का फ़र्क समझ पाते हैं। रास्ते में आये पत्थर से ठोकर खाने के बाद ही ये पता चलता है कि नज़र ज़मीन पर होनी चाहिए। बुरे लोग रास्ते का पत्थर हैं।

हमारे आस पास बुरे लोगों की अधिकता के कुछ कुप्रभाव भी हैं जैसे कि इनसे मिले धोखे के बाद हम लोग अच्छे लोगों को भी शक़ की नज़र से देखने लग जाते हैं या यूँ कहें कि अच्छे लोगों पर भी एक बार में विश्वास नहीं कर पाते। किसी ज़रूरतमंद अच्छे इंसान की भी मदद नहीं कर पाते। बुरे लोग हमें विश्वास में लेकर हमारी मेहनत की गाढ़ी कमाई पर भी हाथ साफ़ कर देते हैं। इन्हीं लोगों की वज़ह से एक आम आदमी अपनी ज़रूरत से अधिक पैसा नहीं कमा पाता। आम आदमी बुरे लोगों से मिले धोखे को अपना मुक़द्दर समझ लेता है और ख़ुद को दिलासा देता है कि भगवान ने मेरी किस्मत में मुफ़लिसी ही लिखी है। वैसे एक बार धोखा ख़ाने के बाद कितना भी मजबूत आदमी हो आख़िरकार टूट ही जाता है। ये बुरे लोग हमें लक्ष्य से भटका देते हैं, मानसिक तनाव देते हैं। बुरे लोग स्वार्थ के परिचायक होते हैं।

वैसे, इतिहास गवाह है कि एक बुरे आदमी की बुराई की वज़ह से ही दूजा आदमी महान कहलाया है। जैसे राम - रावण, कृष्ण - कंस, प्रह्लाद - हिरणाकश्यप और भी बहुत सारे उदाहरण हैं। लेकिन अब महापुरुष जन्म नहीं लेते।

एक मासूम सा सवाल है मेरा, क्या ये धरती कभी स्वर्ग थी ? यदि थी तो क्या फिर कभी ये स्वर्ग बन पायेगी ?

~ मनीष शर्मा

Friday, 21 August 2020

पृष्ठ संख्या सत्रह।

बरसों से अल सुबह पाँच बजे घर के बाहर एक दुपहिया वाहन M80 की आवाज़ आती रही है। M80 से उतरकर हॉकर दरवाज़े के नीचे से एक अख़बार सरकाते हैं। हल्की सी नींद जागती हैं, लेकिन फिर से सो जाता हूँ। वैसे लोग, सुबह की पहली चाय के साथ अख़बार पढ़ते हैं। मैं दोपहर में या संध्याकाल में अख़बार पढ़ता हूँ। संध्याकाल में इसलिए कि सुबह दफ़्तर जाने की जल्दबाज़ी रहती है। इसलिए देश दुनिया की ख़बरों से ज़्यादा ज़रूरी नौकरी प्रतीत होती है।

अख़बार हाथ में लेता हूँ तो उसे हर रोज़ खून से सना पाता हूँ। ख़बरों में से प्रेम लुप्त पाता हूँ। नफ़रत, खून खराबे की ख़बरों से ज़्यादा ख़ास वैसे कुछ होता नहीं है अख़बार में। फिर भी अख़बार के लगभग सारे पन्ने, सारी ख़बरें पढ़ता हूँ। लेकिन पृष्ठ संख्या सत्रह हमेशा छोड़ता आया हूँ। कभी समझने की कोशिश नहीं की अख़बार के इस पन्ने को। ऐसा सोचता आया हूँ कि इस पन्ने को पढ़ता कौन होगा। लेकिन अब, जब अपने भीतर झाँकता हूँ तो ख़ुद को ठगा पाता हूँ कि पूरे अख़बार के ये ही वो पृष्ट हैं, जिसे पढ़ा जाना चाहिए था। बाकी सब पृष्ट हम नहीं पढ़ेंगे तो भी हमें आस पास के लोगों से पता चल ही जाता है कि क्या घट रहा है देश, विदेश और दुनिया में।

अब मुद्दे पर आते हैं कि आख़िरकार क्या था अख़बार के पृष्ठ संख्या सत्रह में। जिसे मैंने हमेशा अनदेखा किया। पछतावा कि क्यों मैंने समय पर इसे समझने का प्रयास नहीं किया। 

अर्थव्यवस्था का सारा हाल बताते थे, ये पृष्ट। सोने-चाँदी के क्या भाव हैं। शेयर मार्केट की क्या चाल है, कौन से शेयर मुनाफ़ा देंगे, कौन से नुकसान। किस म्यूच्यूअल फण्ड में निवेश किया जाये, किसमें नहीं। लेकिन इन सभी से मैं हमेशा दूर रहा। अपने आप बाज़ार कभी समझ में नहीं आया और मैंने इसे कभी समझने का प्रयास किया नहीं। क्योंकि बहुत बड़ी आबादी आज भी इस बाज़ार को सट्टा बाज़ार कहती हैं।

दरअसल हमारी शिक्षा प्रणाली में ही दीमक लगा है। हमारी शिक्षा प्रणाली हमें ग़ुलामी सिखाती है। इसमें आत्मनिर्भर, अमीर बनने का कोई नुस्खा नहीं छिपा है। वैसे कोई पूँजीपति चाहता भी नहीं है कि कोई दूजा उसके समक्ष खड़ा हो। इसीलिए अमीर बनने के रास्ते मुफ़्त में नहीं बताये जाते।

वैसे अमीर बनने का सफ़र बहुत मुश्किल होता है और इस सफ़र को अकेले ही तय करना पड़ता है। साथ ही संपति को भी पर्दे में रखा जाना ज़रूरी होता है क्योंकि... चलिए कुछ बिन कहे, बिन लिखे, समझा जाये तो बेहतर होगा।

जिस तरह बुरी आदतें हमारे भीतर स्वतः उतरती चली जाती हैं। उसी तरह अज्ञानियों तक पहुँचना बहुत सरल होता है। हम उन तक, वे हम तक बड़ी सरलता से पहुँच जाते हैं। लेकिन हमें उन लोगों तक स्वयं ही पहुँचना होता है जिन्होंने अपनी मेहनत के बूते आर्थिक आज़ादी हासिल की।

ख़ैर, बाज़ार को समझें बिना इसमें उतर आना ज़ोखिम से भरा है। किसी भी तरह का निवेश एक जटिल प्रक्रिया है। जानकारी के अभाव में संभव है कि जीवन भर की सारी पूँजी एक ही पल में वाष्प की तरह उड़ जाये।

~ मनीष शर्मा

Sunday, 16 August 2020

दिल की आख़िरी मंज़िल प्यार और पैसा हो।

#RetireYoungRetireRich रॉबर्ट कियोसाकि की इस पुस्तक से प्रेरित होकर के किसी ने जीवन का ताना बाना बुना या नहीं, नहीं पता। मगर एक बात सत्य है कि जिसने कम उम्र में ही अपनी ज़िंदगी में अधिक ख़्याति प्राप्त कर उच्चतम मुक़ाम हासिल कर लिया हो या अपनी आने वाली पीढ़ियों का भी भविष्य अधिक धन कमाकर सुरक्षित कर लिया हो, वो बहुत ज़ल्दी रिटायरमेंट ले लेते हैं। जो लोग ऐसा नहीं कर पाते, उनके लिए रिटायरमेंट आख़िरी साँस तक नहीं आता। वैसे जिसने ज़िंदगी को क़रीब से जाना और बड़ा लक्ष्य बनाकर कड़ी मेहनत की, उसने ज़िंदगी भर मज़े लिये, जिसने नहीं, उसके मज़े ज़िंदगी ने, ज़िंदगी भर लिये।

दिल की सुनो, मगर याद रहे दिल की आख़िरी मंज़िल प्यार और पैसा हो।

~ मनीष शर्मा

Monday, 15 June 2020

सुशांत सिंह राजपूत हमेशा याद रहेंगे।

आत्महत्या करना ग़लत है, बहुत ग़लत। किसी के आत्महत्या किये जाने के बाद हम ये बात कितनी सरलता से कह देते हैं। ऐसा नहीं हैं कि मेरे इस आलेख में, मैं आत्महत्या करने वालों का समर्थन कर रहा हूँ। मैं आत्महत्या जैसे कृत्य की निंदा करता हूँ। लेकिन हमें आत्मीयता रखते हुए हर व्यक्ति के साथ शालीनता और अपनत्व का व्यवहार करना चाहिए। जिससे आत्महत्यायें सरीक़ी घटनाओं पर अंकुश लग सके।

आज तक ना जाने कितने लोगों ने आत्महत्यायें की होगी। लेकिन ना हमने कभी आत्महत्या करने वाले की मनोस्थिति जानने का प्रयास किया। ना ही आत्महत्या करने के पीछे के कारणों को जानने की ज़हमत उठायी। यहाँ तक कि भविष्य में कभी कोई आत्महत्या ना करे इस तरह के एहतियातन क़दम भी नहीं उठाये। उठाते भी तो कैसे हम परिणामों के बाद जागते हैं। परिणाम से पहले हमें सब कुछ सामान्य नज़र आता है। क्या आत्महत्या एक ही पल में लिए जाने वाला फ़ैसला है ? शायद नहीं ! बहुत टूटकर बिखरता होगा वो इंसान, जो आत्महत्या करता है। हर तरफ़ अंधेरा ही अंधेरा। रोशनी की कोई किरण कहीं से भी नज़र नहीं आती दिखाई पड़ती होगी।

आत्महत्या करने के तरीक़े अलग अलग हो सकते हैं। लेकिन कारण एक ही है मानसिक तनाव। ऐसा तनाव जिसमें व्यक्ति को लगता है कि अब इस दुनिया में उसकी बात सुनने, समझने वाला कोई नहीं बचा। वैसे भी इस भागदौड़ भरी दुनिया में किसे फ़ुरसत है किसी की बात सुनने की। हर कोई एक ऐसी दौड़ में दौड़ रहा है जिसकी मंज़िल कहाँ है, कोई नहीं जानता।

ज़्यादातर मामलों में व्यक्ति की आर्थिक स्थिति का कमज़ोर होना भी आत्महत्या का कारण बनती हैं। आत्महत्या को बढ़ावा देने में दकियानूसी समाज भी ज़िम्मेदार हैं। समाज की रिवायतें, हमेशा इंसान की सरलता पर हावी रही हैं। क़दम- क़दम पर बेड़ियाँ बाँधता है समाज। अगर कोई इन बंधनों को तोड़ने के प्रयास करता है तो उसे हज़ारों तोहमतें लगाकर ज़लील किया जाता हैं।

हमारे जीने के सारे अधिकार, हमारे पास नहीं, समाज के पास सुरक्षित हैं।

यहाँ मुझे, मेरा लिखा एक शेर याद आ रहा है। "जीवन सरलता का मज़मा है, इसे जटिलता से मत जियो।"

वैसे आज के दौर में किस पर यक़ीन किया जाये, किस पर नहीं। ये भी एक बहुत बड़ी समस्या हैं। क्योंकि जो हमराज़ होते है, वे ही किसी अलगाव के बाद हमारे सारे राज़ से पर्दाफ़ाश करते हैं।

सुशांत सिंह राजपूत द्वारा की गई आत्महत्या इस बात को और पुख़्ता करती है कि बाहर से खुशमिज़ाज इंसान, भीतर से कितना मायूस, दुःखी हो सकता है। इस घटना के बाद प्रतीत होता है कि ग्लैमर की दुनिया कितनी खोखली है, जिसे देखकर लगता है कि सभी झूठी मुस्कानें लिए जी रहे हैं। ग्लैमर की दुनिया वाले ज़्यादातर लोग दोहरा चरित्र जीते हैं और दोहरा चरित्र एक नया एक दिन व्यक्ति को अवसादग्रस्त बना देता है।

उम्मीद करता हूँ कि इस तरह की घटनाओं पर अंकुश लगे। सभी का व्यवहार, सभी के प्रति सरल और सहज हो क्योंकि हम कौन से सदियाँ जीने आये हैं। जो एक दूजे से जलते हैं। हाड़ माँस के पुतले हैं, एक दिन मिट्टी में मिल जाना तय है, फिर भी जिसे देखो सीने में एक कुफ़्र (आग) लिए घूम रहा है।

एक अच्छे, सरल व्यक्तित्व वाले कलाकार को आज हमने खो दिया। जिसने बहुत कम उम्र में अपनी मेहनत के बूते एक अच्छा मुक़ाम हासिल किया। भगवान आपकी दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान करें। आप हमेशा याद रहेंगे। #SushantSinghRajput

~ मनीष शर्मा


Monday, 11 May 2020

मानव जीवन बनाम अर्थव्यवस्था

दो अलग अलग संस्कृतियाँ, एक पाश्चात्य दूजी भारतीय। एक संस्कृति रिश्तों और मानव जीवन को महत्व देती है तो दूसरी संस्कृति अर्थव्यवस्था को। ज़ाहिर है कि इन दोनों संस्कृतियों में रहने वाले लोगों की सोच भी अपनी अपनी संकृति के मुताबिक़ होगी।

अब मुद्दे पर आते हैं। चाईना से कोरोना फ़ैलना शुरू हुआ। धीरे धीरे सभी देशों में फ़ैल गया। बात अमेरिका और भारत की करते हैं। अमेरिका ने लॉकडाऊन नहीं किया क्यों कि शायद पाश्चात्य संस्कृति में भावनाओं को ज़्यादा जगह नहीं मिलती। वहाँ की सरकार का मानना है कि अर्थव्यवस्था सतत चलती रहनी चाहिए, चाहे लोग क्यों ना मरे। वहाँ की सरकार पहले से ही लगभग इतने लोग कोरोना से मरेंगे के पूर्वानुमान लगा लेती है। वहीं भारत में पहले दिन जनता कर्फ़्यू लगता है। इसके एक दिन बाद पूरे देश में लॉकडाऊन हो जाता हैं। जो जहाँ हैं उसे वहीं रहने का फ़रमान सुना दिया जाता हैं। रेल, बस और हवाई यातायात एकाएक रोक दिया जाता है। हमारे देश में आज से पहले ऐसी स्थिति कभी नहीं हुई। हमारी संस्कृति में मानव जीवन महत्व रखता है। हमारा और हमारी सरकार का मानना है कि जिस देश में जनता ही नहीं बचेगी तो अर्थव्यवस्था किसके काम आयेगी। जनता कुछ दिनों के इस लॉकडाऊन का पूरी तरह से पालन करती हैं कि दूसरे तरफ़ धीरे धीरे कुछ सेवाओं में छूट देते हुए तीसरे लॉकडाऊन की घोषणा कर दी जाती हैं। जनता दो लॉकडाऊन तक तो ख़ुद को संभालती है लेकिन तीसरे लॉकडाऊन तक पहुँचते पहुँचते सब्र का बाँध टूटने लगता है। जनता के सामने दो विकल्प बचते हैं या तो कोरोना से मर जायें या भूख से। भूख से मर जाना, कोरोना से मर जाने भी ज़्यादा बेरहम लगता है इसीलिये जनता को पहला विकल्प ज़्यादा सरल लगता है। वहीं धीरे धीरे सरकार सब कुछ सामान्य करने में जुट जाती हैं। कुछ व्यवसायों में ढ़ील दे दी जाती हैं। आंशिक कर्फ़्यू रखा जाता है।

वहीं इसी दरम्यान कोटा पढ़ाई करने गए छात्रों को बसों द्वारा उनके राज्यों तक पहुँचाया जाता हैं। क्योंकि वे पूँजीपतियों की सन्तान हैं।। लेकिन दूसरे राज्यों में कमाने गए मजदूर अपने घरों के लिए अपने परिवार के साथ मीलों का सफ़र भूखे प्यासे पैदल ही तय करने पर मजबूर होते हैं।

किसी भी देश की जनता को सरकारों द्वारा कभी भी एक जैसा व्यवहार नहीं मिलता।

"मेरा मानना है कि ग़रीब और अमीर के बीच की दीवार कलयुग की समाप्ति से पहले कभी नहीं ढहेगी।"

तीसरे लॉकडाऊन के मध्य में सरकार कुछ मजदूरों को उनके राज्यों तक पहुँचाने में लिए रेलों की व्यवस्था करती है। लेकिन इस व्यवस्था से सभी मजदूर अपने घर तक पहुँच सके, सरकार के लिए ये भी आसान नहीं। एक बड़ी चुनौती है।

लेकिन तीसरे लॉकडाऊन के ख़त्म होने से पहले जनता के सुर बदलने लगते हैं। जनता कहती है कि मजदूरों को अगर उनके राज्यों तक लाया जायेगा तो कोरोना का ख़तरा बहुत ज़्यादा बढ़ जायेगा। अगर सरकार को मजदूरों को लाना ही था तो ये काम पहले लॉकडाऊन से पहले ही कर लिया जाता तो बेहतर होता।

हमारे विचार भी हमारी तरह दोगले हो चुके हैं, बहरूपिये हो चुके हैं। हम तत्कालीन परिस्थितियों को जेहन को में रखते हुए सोचते हैं ना कि दूरग़ामी।

सोचिये अगर सरकार लॉकडाऊन नहीं करती तो शायद अमेरिका से बुरे हालात हमारे देश के हो सकते थे। लॉकडाऊन नहीं करती तो जनता कहती हमने किस सरकार का चुनाव कर लिया जो जनता को नहीं, अर्थव्यवस्था को बचाना चाहती है। इन सबके बीच शायद सरकार भी नहीं बचती। लेकिन सरकार ने जनता को बचाने के पूरे प्रयास किये। प्रश्न ये खड़ा होता है कि क्या मोदी ने जो किया वो सही फ़ैसला था या ट्रम्प ने जो किया वो सही फ़ैसला था।

कोरोना से लड़ाई बहुत लंबी चलेगी। अब हमें हमारी समझदारी ही बचा सकती है।

~ मनीष शर्मा

Tuesday, 31 March 2020

जीवन संघर्ष।

विश्व इतिहास में कोरोना से भयावह मंज़र शायद ही किसी ने कभी सुना हो या देखा हो। अकाल मृत्यु का ग्रास है कोरोना। जिसमें ज़रा सी भी लापरवाही ना जाने कितने लोगों की ज़िंदगी लील सकती हैं। विकसित देशों की सरकारें जब कोरोना के सामने हाथ खड़े कर चुकी हैं तो हम कोरोना पर विजय लचर स्वास्थ्य व्यवस्था के साथ कैसे कर पायेंगे। ये एक ऐसा प्रश्न है जिसका जवाब घर में क़ैद रहकर ही दिया जा सकता है। सरकार चाहती है हम लोग घर मे रहे ताकि ज़िंदा रह सकें। हमें सरकार की बात माननी चाहिए क्यों कि सवाल ज़िंदगी का है।

आर्थिक रूप से सबसे ताक़तवर, सर्वश्रेष्ठ देश होने की ये कैसी होड़ लगी कि आज मानवता ही ख़तरे में पड़ गयी। कल का सूरज कौन देखेगा, कौन नहीं, ये भविष्य की गर्त में छिपा है। मैं हमेशा से कहता आया हूँ कि हाड़ माँस के पुतले को ख़त्म करने के लिए बारूद इकट्ठा ना करें। इस पुतले को उम्र के सत्तर साल तक महफ़ूज़ रख पाने के साधन जोड़े, क्योंकि हम कौन से यहाँ अमर हो के सदियाँ जीने आयें हैं। अस्पताल बनवाने की बजाय हमने मोटे दामों पर हमेशा बारूद ख़रीदा। स्वास्थ्य पर धन खर्च करने की बजाय हमने सैन्य व्यवस्थाओं को दुरुस्त रखने के धन खर्च किया। यहाँ मैं अपने ही कथन का खंडन भी करता हूँ कि तत्कालीन परिस्थितियों पर निर्भर करता है कि हम अपने आने वाले जीवन को कैसे जीयेंगे। हमें बारूद इसलिए जोड़ना पड़ा कि पड़ौसी देशों का हम पर ख़तरा निरंतर बना रहता हैं। पड़ौसी, पड़ौसी का दुश्मन।

इंसान को ज़िंदा रहने के लिए प्रेम चाहिए, हमने नफ़रतों के बाज़ार खोल दिये। कहीं नफ़रत कम ना पड़ जाये तो हमने उसे मज़बूत रखने के लिए धर्म और मज़हब की दुकानें भी लगा दी।

विश्व एक क़ैदखाने में तब्दील हो चुका है। एक ऐसी क़ैद जिसमें धन सम्पन्न लोग अपना समय अच्छे से व्यतीत कर रहे हैं क्योंकि उनके पास वे सभी सुख सुविधाएं हैं जिनके बूते वे कईं महीनों तक ज़िंदा रह सकते हैं। लेकिन वे लोग जो सुबह कमाने के लिए निकलते है शाम को खाते है। वे संघर्ष के बहुत बुरे दौर से गुज़र रहे हैं। लेकिन अभी सवाल ज़िंदा रहने का है रोज़ी रोटी से भी बड़ा सवाल है ज़िंदा रहना। वैसे ग़रीबी से बड़ी कोई बीमारी नहीं। ये बीमारी रोज़ रोज़ थोड़ा थोड़ा मारती है। वैसे अमूमन देखा गया है कि धरती पर जब भी कोई माहमारी फ़ैली है लाखों लोगों की बलि चढ़ी हैं। लेकिन इस बार की माहमारी में भूख से कोई ना मरे ये हमारा परम दायित्व होना चाहिए। सच्ची सेवा मानव सेवा, बाक़ी सब तो ढोंग है, छलावा है।

उम्मीद की जा सकती है कुछ महीनों के बाद सब कुछ पहले की भांति सामान्य हो जायेगा। ज़िंदगी की गाड़ी पटरियों पर दौड़ने लगेंगी। लेकिन तब तक फ़ासलों की खाई बहुत गहरी हो चुकी होगी। कोई किसी के क़रीब आने से भी डरेगा। लोग अपने स्वार्थ के चलते चाहते थे कि उनकी दुनिया सीमित हो। वे फले फूले, भले दुनिया भाड़ में ही क्यों ना जाये। कोरोना ने इतना सीमित कर दिया कि अब कोई किसी से गले ना मिलेगा तपाक से।

वैसे प्रधानमंत्री जी के लॉक डाऊन किये जाने के आदेश के बाद से ही देश की लगभग सारी समस्याएं ख़त्म हो चुकी हैं। इससे ये साबित होता है कि ढेरों समस्याओं को हम बेवज़ह जन्म देते हैं वास्तविकता में समस्याएं कभी इतनी जटिल नहीं होती हैं। हम विकास या प्रगति करने की बजाय समस्याओं को द्रोपदी की चीर की तरह खींचते रहते हैं।

एक निवेदन भारत सरकार से कि जिस तरह सरकार ने सेना को अस्त्र शस्त्र देकर सीमा पर मुस्तैद किया है उसी तरह हमारे देश के डॉक्टर, नर्स, लेबोरेटरी तकनीशियन, तकनीकी एवं नॉन तकनीकी वर्ग के सभी कार्मिक, पुलिस, सफ़ाईकर्मियों एवं वे सभी लोग को अपने घर से बाहर केवल इसलिए हैं कि देश में घर के भीतर बैठे लोग सुरक्षित रह सकें। ऐसे सभी लोगों को कोरोनो से बचाव से संबंधित सभी पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट किट उपलब्ध करावें। ताकि वे अपने कार्यों को बेहतर तरीक़े से संपादित कर सकें।

तस्वीर में जो व्यक्ति दिखाई दे रहे हैं। इनकी सहमति के पश्चात ही इनकी ये तस्वीर खींची गई है। कोरोना से बचाव के लिए इन्होंने नॉन वोवन केरी बैग लगा रखा है।

मिलकर बोये थे सब ने बीज़ काँटों के
वृक्ष बनकर वे आज भला फूल दें कैसे ?
#Corona #Covid19

#झूठ #धोखा #लालच #स्वार्थ #अनीति #पाप #कुकर्म #हिंसा #जीवहत्या

~ मनीष शर्मा

Sunday, 4 August 2019

दोस्त, मिले तो फिर बिछड़े ना।

या रब्बा, या तो दोस्त मिले ना
गर, मिले तो फिर बिछड़े ना

आज के दिन तुम बहुत याद आते हो। तुम्हें भुला पाना नामुमकिन है "रवि"। तुम्हारे जैसा सरल इंसान मैंने तुम्हारे बाद आज तक कभी किसी में नहीं पाया। दोस्ती क्या होती है ये मुझे तुमने सिखलाया।

ग्यारह साल पहले तुम्हारे एक रोड़ एक्सीडेंट में दुनिया से चले जाने के बाद मुझे पेशेवर दोस्त तो बहुत मिले, लेकिन तुम्हारे जैसा सच्चा, निःस्वार्थ दोस्त कभी कहीं नहीं मिला। तुम मेरे पहले और अंतिम मित्र थे।

बचपन से शुरू हुआ सफ़र ज़वानी की दहलीज़ पर पहुंचते ही ख़त्म कर तुम मुझे हमेशा के लिए तन्हा छोड़कर चले गए। तुम्हारे चले जाने का मलाल मुझे ताउम्र रहेगा मित्र।

मोहल्ले की एक ही गली में रहते थे हम दोनों। साथ खेलते थे, साथ स्कूल जाते थे। रवि सैन पढ़ाई में होशियार था और मैं कमज़ोर। मुझे नहीं आने वाले सवालों के ज़वाब भी रवि के पास हुआ करते थे। यहाँ तक कि एक तकनीकी कोर्स भी हमने साथ किया। हम दोनों साइकिल से रोज़ तीन से चार किलोमीटर सवेरे इंस्टिट्यूट जाते और शाम को वापिस आते। शाम को आने के बाद वो कुछ देर मेरे घर रुकता और टीवी पर एक तक फिल्में देखता। उसे फिल्मों का बहुत शौक था। फ़िल्म अगर सन्नी देओल की हो तो देर रात तक मेरे ही घर रुकता। यहाँ तक कि स्टील के चार खानो वाले एक ही टिफ़िन में हमारा खाना डाला जाता था, खाना भी साथ ही खाते थे। मेरे कोई सगा भाई-बहन नहीं हैं। इकलौती संतान हूँ मैं अपने माता पिता की। लेकिन रवि मेरे लिए दोस्त नहीं सगे भाई से भी बढ़कर था।

#FriendshipDay

~ मनीष शर्मा

Wednesday, 3 July 2019

फ़िल्म क़बीर सिंह की समीक्षा।


फ़िल्म क़बीर सिंह की समीक्षा मेरी क़लम से...

फ़िल्म क़बीर सिंह की क़ामयाबी ने ये साबित कर दिया कि भारतीय जनता आज भी सिनेमा के पर्दे पर भावनाओं (Emotions) का सैलाब देखना चाहती है, नफ़रत और हिंसा नहीं।

बात की जाए फ़िल्म के संगीत की तो फ़िल्म का दिलकश संगीत फ़िल्म की सबसे बड़ी ताक़त हैं। सारे गीत कर्णप्रिय हैं। कुछ गीत जुबाँ पर बड़ी आसानी से चढ़ते हैं जिनमें बेख़याली और तुझे कितना चाहने लगे हम प्रमुख हैं

फ़िल्म में क़बीर सिंह का क़िरदार सख़्त और गुस्सैल है लेकिन क़िरदार का दूसरा पहलू ये भी है कि क़बीर सिंह प्रेम से लबरेज़ है। इतने लबरेज़ कि फ़िल्म के पहले हॉफ तक क़बीर सिंह और प्रीति को अपने आस पास की दुनिया नज़र ही नहीं आती। ना उन्हें सुबह की ख़बर होती है ना ही शाम का इल्म। बस एक दूसरे के प्यार में सतह तक डूबे नज़र आते हैं। लेकिन अपने गुस्से के चलते एक दिन क़बीर सिंह अपनी प्रेयसी प्रीति को खो बैठते हैं। उसकी शादी किसी और से हो जाती हैं। लेकिन क़बीर सिंह का अपने दोस्त से एक सवाल कि क्या शादी में इतनी ताक़त होती है जो प्रीति अब लौटकर वापिस मेरे पास नहीं आ सकती। शादी के बंधन की मजबूती को दर्शाता है।

दूसरे हॉफ में क़बीर सिंह प्यार में नाकामी और प्रीति को खो देने के ग़म में ख़ुद को नशे में झोंक देते हैं। सिगरेट से शुरू हुआ नशा शराब तक पहुँचता है और शराब से शुरू हुआ नशा ड्रग्स तक। नशा जितना बढ़ता है क़बीर सिंह की मोहब्बत प्रीति से दिन ब दिन उतनी ही बढ़ती चली जाती है साथ ही प्रीति से बिछड़ने का ग़म भी, लेकिन यहाँ एक बात ग़ौर किये जाने की ये है कि क़बीर सिंह को प्रीति से बेतहाशा मोहब्बत है लेकिन किसी और से शारीरिक संबंध बनाने से क़बीर सिंह पीछे नहीं हटते। ये अलग बात है कि कुछ कारणवश संबंध बन नहीं पाते। क़बीर सिंह ज़िस्म की ज़रूरत के आगे बेबस नज़र आते है जहाँ ये ख़्याल जहन से छूट जाता है कि उनका दिल प्रीति के पास है। वैसे इस दौर का युवा बिल्कुल क़बीर सिंह की तरह दिल और ज़िस्म के बीच की जद्दोजहद में नहीं पड़ता। वो सही और ग़लत का चुनाव अपने विवेक से करता है। दुनिया जिसे ग़लत कहती वो उसे सही कहता है।

कुछ बरस पहले तक रोमांस दीवारों, पर्दों और हदों का मोहताज़ हुआ करता था। लेकिन आज का युवा क़बीर सिंह की तरह अपनी प्रेयसी के साथ रोमांस करते वक़्त ये अपने इर्द गिर्द ये नहीं देखता कि उसे कितनी नज़रें घूर रही हैं। वो क़बीर सिंह की तरह ये भी नहीं देखता कि चलती हुई मोटरसाइकिल पर चुम्बन लेते हुए गिर जाने से कुछ चोट ख़रोंच भी आ सकती है या दोनों की हड्डियाँ भी टूट सकती है वैसे मोटरसाइकिल पर चुम्बन लेने को लेकर कोई सख़्त क़ानून अब तक नहीं बना है। जब तक कोई क़ानून नहीं बन जाता प्रेमी प्रेयसी ऐसा कर सकते हैं।

क़बीर सिंह की दादी फ़िल्म में बहुत गहरा प्रभाव छोड़ती हैं। यूँ तो उनकी कही हर एक बात सीधे दिल को छूती है लेकिन उनकी एक बात छाप छोड़ जाती है कि जब हम किसी से बेहद प्यार करते है और वो इंसान दुनिया छोड़कर हमेशा के लिए चला जाता है तो मन को समझाया जा सकता है कि अब वो इंसान इस दुनिया में नहीं है, वो कभी लौटकर नहीं आयेगा। लेकिन जिस इंसान से हम बेहद प्यार करते है वो ज़िंदा हो और हम उससे कभी मिल नहीं सकते, उसे पा नहीं सकते। इस स्थिति में इंसान ज़िंदा लाश समान है।

क़बीर सिंह फ़िल्म का अंत सुखद है जिसमें दोनों के परिवार उन्हें और उनके प्यार को स्वीकार कर लेते हैं। उसी तरह मेरा मानना है कि वैसे भी दुनिया थोड़े से समय के बाद कभी कुछ नहीं कहती। ये हम ही हैं जो क़यास लगाते हैं कि दुनिया हमारे बारे में क्या सोचती होगी। वैसे दुनिया के मंत्र का प्रभाव उन्हीं लोगों पर असर करता है जो उसे अपने ऊपर हावी होने देते हैं।

आज का युवा बिंदास जीना चाहता हैं। ज़िंदगी में बिना किसी की दख़लअंदाज़ी के। उड़ना चाहता है, गिरना चाहता है फिर संभलना चाहता है।

जिस तरह ठहरा हुआ पानी कभी शोर नहीं करता, जब तक कि उसमें कोई कंकर ना फ़ेंक दे। लोगों से उसकी भी यही अपेक्षा रहती है कि ख़ामोशी से बह रही ज़िंदगी के तालाब में कभी कोई कंकर ना फ़ेंके। अगर फिर भी कोई कंकर फ़ेंककर छींटे उड़ा भी दे तो उसे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। क्योंकि ज़माने में इश्क़ के परिंदो ने प्यार करने के तौर तरीक़े अब क़बीर सिंह की तरह बदल लिए हैं।

~ मनीष शर्मा

#KabirSingh is 200 Not Out 🔥🔥🔥... Hits double century at the BO, but shows no signs of fatigue... [Week 2] Fri 12.21 cr, Sat 17.10 cr, Sun 17.84 cr, Mon 9.07 cr, Tue 8.31 cr, Wed 7.53 cr. Total: ₹ 206.48 cr. India biz. Blockbuster.

#KabirSingh benchmarks...
Crossed ₹ 50 cr: Day 3
₹ 100 cr: Day 5
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₹ 200 cr: Day 13
India biz.
Days taken to reach ₹ 200 cr... 2019 releases...

⭐️ #KabirSingh: Day 13
⭐️ #Bharat: Day 14
⭐️ #Uri: Day 28
India biz.
Data source : Taran Adarsh


Monday, 31 December 2018

नववर्ष अभिनंदन

छात्रसंघ राजकीय पी. जी. महाविद्यालय, बाड़मेर अंतरप्रांतीय कुमार साहित्य परिषद एवं उजास संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में नववर्ष पर आयोजित कवि सम्मेलन में कविता पाठ करते हुए।








Sunday, 30 September 2018

आधुनिक भारत।

आधुनिक भारत।

भारत इस वक़्त आर्थिक संकट से गुज़र रहा है। मगर सरकार का कहना है कि ऐसा कुछ नहीं हैं। अगर ऐसा कुछ नहीं हैं तो डॉलर की तुलना में रुपये की क़ीमत क्यों गिर रही हैं ? पेट्रोल - डीजल से लेकर खाने पीने की सभी चीज़ों के भाव आसमान क्यों छू रहे हैं ? तो फिर क्यों कुछ शहरों में लोग इस आर्थिक संकट की वज़ह से शहर से अपने गाँवों का रूख़ कर रहे हैं ?

सरकार और विपक्ष अपनी ग़ौरव बख़ान गाथायें गा रही हैं। जिन मुद्दों पर सरकार और विपक्ष को मंथन करने की आवश्यकता है उन मुद्दों पर इनका ध्यान कभी नहीं जाता। जैसे - जनसंख्या वृद्धि, भुखमरी, स्वास्थ्य, कुपोषण, धर्म, जातिवाद, आरक्षण और महिला सुरक्षा इत्यादि।

रोज़गार के अवसर इतने कम हो चुके हैं कि उच्च शिक्षा वाले लोग निम्न शिक्षा वाले लोगों के रोज़गार का चुनाव करने लगे हैं। निम्न शिक्षा वाले लोग हमाल मजदूरी करने पर मजबूर हैं।

सरकार पोषण पर आजकल बहुत सारे कार्यक्रम चला रही हैं। मगर दूर तक पोषण किसी गरीब के शरीर में नज़र नहीं आता। पोषण से जुड़ी बातें किताबी रह गई हैं। यहाँ तक कि फुटपाथ पर रहने वाले लोगों के लिए सूखी रोटी ही पोषण हैं। वे जैसे तैसे एक वक्त की रोटी का जुगाड़ कर लेते है लेकिन शाम को उसका भी जुगाड़ होगा या नहीं इस बात की कोई गारंटी नहीं।

71 साल पहले मिली आज़ादी की क़ीमत अब सब भुला चुके हैं। वैसे ग़ुलामी करवाने वालों ने सिर्फ़ चेहरा बदला हैं। पहले गोरे थे, अब अपने ही रंग के हैं। ग़ुलाम हम पहले भी थे ग़ुलाम हम आज भी हैं। अगर ग़ुलाम नहीं है तो चुनाव हो जाने के बाद जिस प्रत्याशी को हम चुनते है। उसके द्वारा जनहित के कार्य सही प्रकार से नहीं किये जाने पर जनता मूक दर्शक की भाँति देखने के सिवाय क्या कर सकती है ? क्या उसे 5 साल से पहले बदल पाने का अधिकार जनता के पास हैं ?

जनता सच में मजबूर हैं और भारत से विकास कोसों दूर।

तस्वीर स्त्रोत : गूगल

~ मनीष शर्मा

Tuesday, 18 September 2018

लेखक तन्हा।

अगर आपका लेखन से दूर तलक़ कोई वास्ता नहीं है तो कतई सच्चे प्यार के चक्कर में ना पड़ें। सिर्फ़ पैसा कमायें। लेखकों को प्यार करना इसलिए जरूरी होता है कि दिल लगाने से लेकर दिल तुड़वाने तक लगभग सभी तरह के खुशियाँ और ग़म भरे गीत, शायरी, गज़ल, नज़्म, कवितायें और कहानियाँ लिखनी होतीं हैं।
वैसे अंत में वही सच्चा प्यार झूठा निकलता हैं और लेखक तन्हा।

~ मनीष शर्मा

Monday, 10 September 2018

“मैं”

हमारे ठाकुर जी की एक लघु कथा

“मैं”

मैं, ठाकुर जी और मेरी मम्मी जी हर शाम स्टेडियम जाते हैं। मैं जॉगिंग के लिए, ठाकुर जी झूले खाने, घूमने के लिए और मेरी मम्मी जी ठाकुर जी का ख़्याल रखने के लिए।

कल मेरी जॉगिंग पूरी हो जाने के बाद मैं ठाकुर जी के पास आया। ठाकुर जी मिट्टी में बैठे खेल रहे थे। ठाकुर जी जहाँ बैठे थे वहां से दस क़दम की दूरी पर दो नंग धड़ंग बच्चे जिनकी उम्र ठाकुर जी की उम्र से तक़रीबन पाँच साल ज़्यादा रही होगी दोनों कुश्ती कर रहे थे और मिट्टी में खेलते खेलते भौंहें ऊपर करके कुश्ती कर रहे उन बच्चों को ठाकुर जी बार बार देख रहे थे।

‘वैसे ठाकुर जी को कुश्ती का बड़ा शौक़ है। हर रोज़ मेरे और ठाकुर जी के बीच पलँग पर कुश्ती होती हैं।’ इसी कुश्ती के दरम्यां ठाकुर जी की मम्मी जी को बस एक ही फ़िक्र कि ठाकुर जी और आप पलंग तोड़ दोगे।

मैं उन कुश्ती कर रहे बच्चों के पास गया और एक बच्चे से बोला क्या आप ठाकुर जी से कुश्ती करेंगें। बच्चा बोला हाँ जी।

मग़र मैंने बच्चे के कान में धीरे से फुसफुसाते हुए कहा कि आपको ठाकुर जी से हारना है। बच्चा सहजता से बोला ‘जी’ मैं हारने को तैयार हूँ।

इतने में ठाकुर जी से मेरी मम्मी जी का एक सवाल - ठाकुर जी आपको क्या पसंद है ? पढ़ाई या खेलना ? ठाकुर जी का जवाब दोनों ही नहीं। मुझे तो बच्चों से लड़ना पसंद हैं।

कुश्ती का पहला चरण शुरू हुआ ठाकुर जी ने ज़ोर आज़माया और उस बच्चे को हरा दिया। क्रमशः दूसरे, तीसरे और चौथे चरण में भी ऐसा ही हुआ। ठाकुर जी ने उस बच्चे को हर बार हरा दिया। ठाकुर जी बहुत ख़ुश थे और ज़ोर ज़ोर से हंस रहे थे। मैं ठाकुर जी से भी ज़्यादा ख़ुश था। ऐसी ख़ुशी मुझे कभी मेरे जीतने पर भी नहीं हुई। मग़र मुझे ठाकुर जी की उस वास्तविक जीत का इन्तज़ार हमेशा रहेगा जो उनके पुरुषार्थ के दम पर होगी। ऐसा एक दिन ज़रूर आयेगा, मुझे पूरा यक़ीन हैं।

हम लोग आज भी स्टेडियम गये। स्टेडियम पहुंचते ही मैं जॉगिंग करने लगा और ठाकुर जी खेलने लग गये।

कुछ देर बाद मैं ठाकुर जी के पास आया तो ठाकुर जी की आँखों में उन बच्चों का इंतज़ार साफ़ नज़र आ रहा था।

एकाएक ठाकुर जी ने सवाल किया पापाजी आज वो बच्चे नहीं आये ?

मैंने ठाकुर जी से कहा - हाँ आज वो बच्चे नहीं आये। आपने उन्हें कल कुश्ती में बुरी तरह से हरा दिया इसीलिए आज वे डर के मारे नहीं आये। ये सुन ठाकुर जी के चेहरे पर मंद मंद मुस्कुराहट आयी और अपनी भुजा को उठा अपनी ताक़त का प्रदर्शन करने लगे और दाँत भींचते हुए कहने लगे ‘देखा पापा जी में कितना ताक़तवर हूँ।' मुझे और मेरी मम्मी जी को ज़ोरों की हंसी आ रही थी।

सारांश - बड़े तो बड़े छोटे बच्चे भी अहंकार से भरे होते हैं। दूसरे शब्दों में यूँ कहूँ की हर एक शख्स तारीफ़ का मोहताज़ हैं। इंसान की गई सही तारीफ़ उसे शिखर पर भी ले जा सकती है तो झूठी उसे हाशिये पर भी ला सकती हैं। मुझे ठाकुर जी को इसी अहंकार से बचाये रखते हुए सही तारीफ़ का हक़दार बनाये रखने के साथ साथ एक अच्छा इंसान भी बनाये रखने की पूरी कोशिश करनी हैं।

क्योंकि अहंकार इंसान की इंसानियत को ज़िंदा निगल जाती हैं। भगवान ठाकुर जी को हमेशा हर बुरी नज़र से बचाये रखे।

तस्वीर कुश्ती से ठीक पहले की।

~ मनीष शर्मा


Tuesday, 3 July 2018

फ़िल्म संजू की समीक्षा मेरी कलम से।

ज़िंदगी को अपनी शर्तों पर जिया जाना चाहिए। मगर शर्ते जब कोई और तय कर दे तो फिर रास्ते बदल लेना ही ठीक रहता हैं।

कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना।

मैंने दो दिन पहले फ़िल्म संजू देखी। इस फ़िल्म के ट्रेलर ने मन में पहले से ही उत्पात मचा रखा था। राजकुमार जी हिरानी ने ट्रेलर में ही फ़िल्म की तस्वीर लगभग साफ़ कर दी थी। फ़िल्म के विषय को जिस इंसान पर केन्द्रित किया गया। उस इंसान की ज़िंदगी किसी आम या ख़ास आदमी या औरत द्वारा जी पाना तो दूर की बात है उसके बारे में सोचना भी भारत जैसे देश में बहुत मुश्किल होगा।

फ़िल्म संजू को हीरो बनाती है या विलेन इस पर विभिन्न मत हो सकते हैं। कोई कहेगा संजू के बारे में आधा सत्य दिखाया गया ताकि फ़िल्म को कॉमर्शियल बनाया जा सके। तो कोई कहेगा कि फ़िल्म में वो सब कुछ नहीं दिखाया जाना चाहिए जिससे कि संजू की छवि जनता में विलेन की तरह उभरे। तो कोई कहेगा कि संजू को एक हीरो की तरह पर्दे पर उतारा गया।

वैसे फ़िल्म के मुताबिख़ संजू ने पहली बार ड्रग्स इसलिए ली कि वो पिता से ख़फ़ा थे। दूसरी बार इसलिए कि उनकी माँ को कैंसर हो चुका था और तीसरी बार तक वो आदतन नशेड़ी बन चुके थे।

सुनिल दत्त साहब एक महान इंसान थे। फ़िल्म देखने के बाद मेरी नज़र में उनकी इज़्ज़त और भी बढ़ गयी। एक पिता ने अपने बच्चे के लिए कितना संघर्ष किया ये पर्दे पर दिखाए जाने से पहले शायद ही किसी ने जाना हो। लेकिन यहाँ ग़ौर किये जाने वाली बात ये है कि संजू उस रास्ते पर क्यों चल पड़े जिस रास्ते की मंज़िल एक वीरान उजड़ी इमारत सी सिर्फ़ और सिर्फ पश्चाताप लिए मिलती हैं। अक़्सर भारत में एक पिता और पुत्र के बीच वो रिश्ता नहीं बन पाता जिसे दोस्ती का नाम दिया जा सके। शायद इसलिए भी नहीं कि एक पिता को ये भय रहता हो कि कहीं उसका लाड प्यार उसके पुत्र को बिगाड़ ना दे। लेकिन फ़ासले भी अलगाव लेकर के आते हैं ये बात संजू की कहानी में देखने को मिलती हैं। अगर पिता पुत्र के बीच रिश्ता सरल और सहज होता तो शुरुआती वक़्त में ही संजू द्वारा चुने गए कांटों भरे रास्ते को उनके पिता फूलों भरे रास्ते में बदल देते। जहाँ दूर दूर तक कोई भटकाव ना होता।

काश संजू जितना बेबाक़ भारत का हर एक इंसान होता। जो अपनी ज़िंदगी के वो राज़ भी बड़ी आसानी से खोल देता जिसे इंसान अपने सीने में दफ़न कर चुका होता है। दफ़न इसलिए कि कहीं राज़ ने कफ़न उघाड़ लिया तो ज़िंदगी ना जाने कितनी तबाहियाँ लिए हुए आ सकती हैं। अमूमन इस तरह के राज़ एक पुरुष की अपेक्षा एक महिला की ज़िंदगी में ज़लज़ला लाती हैं। क्यों कि हर आदमी का अतीत अच्छा और बुरा दोनों तरह का होता है।

फ़िल्म संजू के एक संवाद में अनुष्का शर्मा रणबीर कपूर से पूछती है - "संजू अपनी बीवी के अलावा तुम कितनी औरतों के साथ सोये हो ? संजू कहते हैं - प्रोस्टिट्यूटूटस को गिनु या उनको अलग। नहीं उनको अलग। नहीं अलग रखता हूँ। नहीं 308 तक याद हैं। चलो आप शिफ्टिंग के लिए 350 लिख लो। तो क्या इसका मतलब ये समझा जाये कि संजू भारतीय सभ्यतानुसार चरित्रहीन रहे ? ज़्यादातर लोगों का जवाब होगा हाँ। हाँ इसलिए कि संजू ने ये सहज स्वीकार कर लिया कि उसके संबंध कईं महिलाओं के साथ रहे। ये अलग बात है कि संजू से भी दो क़दम आगे रहे लोगों का दामन आज भी पाक है। क्योंकि उन्होंने वो सब करते हुए एक पर्दे की आड़ ली।

या फिर बात अगर की जाये क्यूबा के क्रांतिवीर फिदेल कास्त्रो की तो उन्होंने भी संजू की तरह पूरी दुनिया के सामने ये सहज़ स्वीकार किया कि उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी में अनुमानित 35000 महिलाओं के साथ शारीरिक संबंध बनाये। लेकिन उनकी छवि दागदार नहीं हैं क्यों कि वो पाश्चात्य संस्कृति से हैं जिन्हें हम अक़्सर चरित्रहीन कहकर टाल देते हैं। वैसे जिसे पाया ना जा सके उसमें नुक़्स निकालकर उसे छोड़ देना सबसे बेहतर उपाय तलाशा है हमने।

कहीं ना कहीं संजू की ज़िंदगी में जो बदनुमा दाग ड्रग्स और बंदूक का रहा। वो दर्शाता है कि एक नकारा सिस्टम आदमी को वो बनने पर मजबूर कर देता है जो वो कभी नहीं बनना चाहता। अपने पिता और परिवार को जान से मारने की मिल रही धमकियों पर सिस्टम का कोई एक्शन नहीं हुआ तो बंदूक से पाला पड़ गया। ध्यान दिलाना चाहूँगा कि यहाँ मैं संजू का उसके परिवार के लिए जोश और जुनून में लिया गया फ़ैसला तात्पर्य कि आत्मसुरक्षा के लिए बंदूक लिए जाने का समर्थन नहीं कर रहा। लेकिन सिस्टम अगर सही काम करता तो संजू का कभी जेल से भी वास्ता ना पड़ता।

इतने बुरे दौर से गुज़र कर लौट आना किसी भी इंसान के लिए मुनासिब नहीं होता। मगर भूत, वर्तमान और भविष्य की पेशमपेश में फंसे संजू ने आख़िर में मैदान फ़तह किया।

फ़िल्म की समीक्षा लिखते हुए अंत में मैं सिर्फ़ इतना कहना चाहूँगा कि एक हारे हुए इंसान के जीतने की कहानी हैं संजू। फ़िल्म हर एक कसौटी पर बेहतरीन हैं। फ़िल्म का हर एक कलाकार ने अपने क़िरदार में जान फूंक दी हैं। डायरेक्टर का विज़न उनकी पिछली फ़िल्म की भाँति बिल्कुल सही और सटीक है। किसी भी जगह फ़िल्म ढीली दिखाई नहीं पड़ती। फ़िल्म एक सबसे अच्छा संदेश ये देती है कि हर इंसान परिणाम से वाकिफ़ होता है फिर भी वो कर्म कर बैठता जो अंत में उसे आत्मग्लानि से भर देता हैं। इसीलिए ये 
हमेशा याद रखा जाना ज़रूरी है कि रिश्तों में कभी वो दरार ना आने पाये जिसे कभी भी भरा ना जा सके। या जिनके कारण अपने अपनों से इतने दूर चले जायें कि वापसी मुश्किल बहुत मुश्किल हो जाये। या फिर वापसी करते हुए सिर्फ़ और सिर्फ़ पश्चाताप के अलावा कुछ ना हों।

एक बात और येे कि हम किसी भी अहंकारवश बहुत सी बातें कभी किसी से कह नहीं पाते। फिर वो बात चाहे किसी से माफ़ी माँगने की हो या प्यार ज़ाहिर किये जाने की। जैसा कि फ़िल्म में दिखाया गया है कि संजय दत्त भी सुनिल दत्त साहब को वो सब कहना चाहते थे जो बरसों से उनके दिल में दबा था। मगर कह पाने से पहले ही दत्त साहब संजय दत्त को छोड़कर हमेशा हमेशा के लिए भगवान के पास चले जाते हैं। इससे पहले कि हमारे अपने किसी दिन दूर चले जायें एक बार जादू की झप्पी ले ली जाये और ज़िंदगी को काश कहने से बचा लिया जाये। 

#ManishSharma