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Monday, 31 December 2018

नववर्ष अभिनंदन

छात्रसंघ राजकीय पी. जी. महाविद्यालय, बाड़मेर अंतरप्रांतीय कुमार साहित्य परिषद एवं उजास संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में नववर्ष पर आयोजित कवि सम्मेलन में कविता पाठ करते हुए।








Saturday, 31 December 2016

नववर्ष नयी सी आभायें बिखेरने आया हैं।

Happy New Year

नववर्ष नयी सी आभायें बिखेरने आया हैं
जीवन में उमंग, तरंग, आनंद भरने आया हैं
नवचेतना का नव संचार करने आया हैं
जीवन मूल्यों को नव आधार देने आया हैं
जीवन के सुनहरे से केनवास पर
ख़ुशहाली की नव तस्वीर बनाने आया हैं
गत वर्ष जिन रंगों से अछूता रहा जीवन
मुट्ठी में भर उन रंगों को उछालने आया हैं।

#ManishSharma

Saturday, 12 November 2016

ताउम्र पैसों के इर्द गिर्द घूमती रही कमबख़्त ज़िंदगी...

ताउम्र पैसों के इर्द गिर्द

घूमती रही कमबख़्त ज़िंदगी

रिश्तों की परछाईयाँ

अंधेरों में ढूँढती रही ज़िंदगी

पैसा हाथ से फ़िसला

रिश्ते लकीरों से गिरे

फ़िर भी गुरेज़ से ऊँचा

मस्तक किये भागती रही ज़िंदगी

बचपन में खेल खिलौनों से

जी भर मन बहलाया

युवावस्था से मरणासन्न तक

पैसों से ख़ूब खेलती रही ज़िंदगी

पलकें ख़्वाहिशों का बोझ ढोये

सफ़र तय करती रही मीलों का

बहरूपिये पैसे संग

आँख मिचौली करती रही ज़िंदगी

ताउम्र पैसों के इर्द गिर्द

घूमती रही कमबख़्त ज़िंदगी

रिश्तों की परछाईयाँ

अंधेरों में ढूँढती रही ज़िंदगी !!!

#ManishSharma

Monday, 15 August 2016

आज़ादी की एक भोर ऐसी भी होगी...

शरीर तो आज़ाद हो गये थे 1947 में

सोच आज भी इंतज़ार में हैं रिहाई के

विकार के सारे बादल छंट जायेंगे इक दिन

हर एक कोने में धूप छम से बिखर जायेगी

सारे भेद मिटा उस दिन हम इंसान बन जायेंगे

उस दिन सभी की थाली में रोटी होगी

किसी की भी आँखें नम ना होगी

जमीं पर प्रेम और वात्सल्य की बरखा होगी

आज़ादी की एक भोर ऐसी भी होगी

जाति, धर्म और मज़हब की आड़ में

ना किसी की कुटिया जलेगी

ना किसी की चिता सुलगेगी

ना कोई बेबस होके सूत भरेगा

ना ही कोई जीते जी रोज़ मरेगा

बहन बेटियाँ और बहुओं की

अस्मत तार तार ना होगी

सारा देश उनके घर सा होगा

और वो ख़ुद को महफूज़ समझेगी

आज़ादी की एक भोर ऐसी भी होगी

उस दिन जश्न ए आज़ादी सही मायनों में होगी !!!

#ManishSharma

Happy Independence Day

Sunday, 12 October 2014

जन्नत सिसक रहा है !!!

बाढ़ग्रस्त हैं गलियां सारी

विकट परिस्थितियाँ हुई हैं भारी

चीत्कार रहे हैं सारे कूचे

नम निगाहें इधर उधर

बस अपनों को ही ढूंढें

ग़म भारी है और दर्द हावी

हर ओर फैली भयावह त्रासदी

डल तबाह हो चुकी है

शिकरे सभी हुए तहस नहस

कोई तो देखो, कोई तो थामों

नम निगाहें मदद मांगे

उदास चेहरे भीतर झांके

कश्मीर (जन्नत) सिसक रहा है

अपने ज़ख्मों पर फफक रहा है

कश्मीर (जन्नत) सिसक रहा है

अपने ज़ख्मों पर फफक रहा है !!!

Poet : Manish Sharma