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Monday, 11 May 2020

मानव जीवन बनाम अर्थव्यवस्था

दो अलग अलग संस्कृतियाँ, एक पाश्चात्य दूजी भारतीय। एक संस्कृति रिश्तों और मानव जीवन को महत्व देती है तो दूसरी संस्कृति अर्थव्यवस्था को। ज़ाहिर है कि इन दोनों संस्कृतियों में रहने वाले लोगों की सोच भी अपनी अपनी संकृति के मुताबिक़ होगी।

अब मुद्दे पर आते हैं। चाईना से कोरोना फ़ैलना शुरू हुआ। धीरे धीरे सभी देशों में फ़ैल गया। बात अमेरिका और भारत की करते हैं। अमेरिका ने लॉकडाऊन नहीं किया क्यों कि शायद पाश्चात्य संस्कृति में भावनाओं को ज़्यादा जगह नहीं मिलती। वहाँ की सरकार का मानना है कि अर्थव्यवस्था सतत चलती रहनी चाहिए, चाहे लोग क्यों ना मरे। वहाँ की सरकार पहले से ही लगभग इतने लोग कोरोना से मरेंगे के पूर्वानुमान लगा लेती है। वहीं भारत में पहले दिन जनता कर्फ़्यू लगता है। इसके एक दिन बाद पूरे देश में लॉकडाऊन हो जाता हैं। जो जहाँ हैं उसे वहीं रहने का फ़रमान सुना दिया जाता हैं। रेल, बस और हवाई यातायात एकाएक रोक दिया जाता है। हमारे देश में आज से पहले ऐसी स्थिति कभी नहीं हुई। हमारी संस्कृति में मानव जीवन महत्व रखता है। हमारा और हमारी सरकार का मानना है कि जिस देश में जनता ही नहीं बचेगी तो अर्थव्यवस्था किसके काम आयेगी। जनता कुछ दिनों के इस लॉकडाऊन का पूरी तरह से पालन करती हैं कि दूसरे तरफ़ धीरे धीरे कुछ सेवाओं में छूट देते हुए तीसरे लॉकडाऊन की घोषणा कर दी जाती हैं। जनता दो लॉकडाऊन तक तो ख़ुद को संभालती है लेकिन तीसरे लॉकडाऊन तक पहुँचते पहुँचते सब्र का बाँध टूटने लगता है। जनता के सामने दो विकल्प बचते हैं या तो कोरोना से मर जायें या भूख से। भूख से मर जाना, कोरोना से मर जाने भी ज़्यादा बेरहम लगता है इसीलिये जनता को पहला विकल्प ज़्यादा सरल लगता है। वहीं धीरे धीरे सरकार सब कुछ सामान्य करने में जुट जाती हैं। कुछ व्यवसायों में ढ़ील दे दी जाती हैं। आंशिक कर्फ़्यू रखा जाता है।

वहीं इसी दरम्यान कोटा पढ़ाई करने गए छात्रों को बसों द्वारा उनके राज्यों तक पहुँचाया जाता हैं। क्योंकि वे पूँजीपतियों की सन्तान हैं।। लेकिन दूसरे राज्यों में कमाने गए मजदूर अपने घरों के लिए अपने परिवार के साथ मीलों का सफ़र भूखे प्यासे पैदल ही तय करने पर मजबूर होते हैं।

किसी भी देश की जनता को सरकारों द्वारा कभी भी एक जैसा व्यवहार नहीं मिलता।

"मेरा मानना है कि ग़रीब और अमीर के बीच की दीवार कलयुग की समाप्ति से पहले कभी नहीं ढहेगी।"

तीसरे लॉकडाऊन के मध्य में सरकार कुछ मजदूरों को उनके राज्यों तक पहुँचाने में लिए रेलों की व्यवस्था करती है। लेकिन इस व्यवस्था से सभी मजदूर अपने घर तक पहुँच सके, सरकार के लिए ये भी आसान नहीं। एक बड़ी चुनौती है।

लेकिन तीसरे लॉकडाऊन के ख़त्म होने से पहले जनता के सुर बदलने लगते हैं। जनता कहती है कि मजदूरों को अगर उनके राज्यों तक लाया जायेगा तो कोरोना का ख़तरा बहुत ज़्यादा बढ़ जायेगा। अगर सरकार को मजदूरों को लाना ही था तो ये काम पहले लॉकडाऊन से पहले ही कर लिया जाता तो बेहतर होता।

हमारे विचार भी हमारी तरह दोगले हो चुके हैं, बहरूपिये हो चुके हैं। हम तत्कालीन परिस्थितियों को जेहन को में रखते हुए सोचते हैं ना कि दूरग़ामी।

सोचिये अगर सरकार लॉकडाऊन नहीं करती तो शायद अमेरिका से बुरे हालात हमारे देश के हो सकते थे। लॉकडाऊन नहीं करती तो जनता कहती हमने किस सरकार का चुनाव कर लिया जो जनता को नहीं, अर्थव्यवस्था को बचाना चाहती है। इन सबके बीच शायद सरकार भी नहीं बचती। लेकिन सरकार ने जनता को बचाने के पूरे प्रयास किये। प्रश्न ये खड़ा होता है कि क्या मोदी ने जो किया वो सही फ़ैसला था या ट्रम्प ने जो किया वो सही फ़ैसला था।

कोरोना से लड़ाई बहुत लंबी चलेगी। अब हमें हमारी समझदारी ही बचा सकती है।

~ मनीष शर्मा

Tuesday, 31 March 2020

जीवन संघर्ष।

विश्व इतिहास में कोरोना से भयावह मंज़र शायद ही किसी ने कभी सुना हो या देखा हो। अकाल मृत्यु का ग्रास है कोरोना। जिसमें ज़रा सी भी लापरवाही ना जाने कितने लोगों की ज़िंदगी लील सकती हैं। विकसित देशों की सरकारें जब कोरोना के सामने हाथ खड़े कर चुकी हैं तो हम कोरोना पर विजय लचर स्वास्थ्य व्यवस्था के साथ कैसे कर पायेंगे। ये एक ऐसा प्रश्न है जिसका जवाब घर में क़ैद रहकर ही दिया जा सकता है। सरकार चाहती है हम लोग घर मे रहे ताकि ज़िंदा रह सकें। हमें सरकार की बात माननी चाहिए क्यों कि सवाल ज़िंदगी का है।

आर्थिक रूप से सबसे ताक़तवर, सर्वश्रेष्ठ देश होने की ये कैसी होड़ लगी कि आज मानवता ही ख़तरे में पड़ गयी। कल का सूरज कौन देखेगा, कौन नहीं, ये भविष्य की गर्त में छिपा है। मैं हमेशा से कहता आया हूँ कि हाड़ माँस के पुतले को ख़त्म करने के लिए बारूद इकट्ठा ना करें। इस पुतले को उम्र के सत्तर साल तक महफ़ूज़ रख पाने के साधन जोड़े, क्योंकि हम कौन से यहाँ अमर हो के सदियाँ जीने आयें हैं। अस्पताल बनवाने की बजाय हमने मोटे दामों पर हमेशा बारूद ख़रीदा। स्वास्थ्य पर धन खर्च करने की बजाय हमने सैन्य व्यवस्थाओं को दुरुस्त रखने के धन खर्च किया। यहाँ मैं अपने ही कथन का खंडन भी करता हूँ कि तत्कालीन परिस्थितियों पर निर्भर करता है कि हम अपने आने वाले जीवन को कैसे जीयेंगे। हमें बारूद इसलिए जोड़ना पड़ा कि पड़ौसी देशों का हम पर ख़तरा निरंतर बना रहता हैं। पड़ौसी, पड़ौसी का दुश्मन।

इंसान को ज़िंदा रहने के लिए प्रेम चाहिए, हमने नफ़रतों के बाज़ार खोल दिये। कहीं नफ़रत कम ना पड़ जाये तो हमने उसे मज़बूत रखने के लिए धर्म और मज़हब की दुकानें भी लगा दी।

विश्व एक क़ैदखाने में तब्दील हो चुका है। एक ऐसी क़ैद जिसमें धन सम्पन्न लोग अपना समय अच्छे से व्यतीत कर रहे हैं क्योंकि उनके पास वे सभी सुख सुविधाएं हैं जिनके बूते वे कईं महीनों तक ज़िंदा रह सकते हैं। लेकिन वे लोग जो सुबह कमाने के लिए निकलते है शाम को खाते है। वे संघर्ष के बहुत बुरे दौर से गुज़र रहे हैं। लेकिन अभी सवाल ज़िंदा रहने का है रोज़ी रोटी से भी बड़ा सवाल है ज़िंदा रहना। वैसे ग़रीबी से बड़ी कोई बीमारी नहीं। ये बीमारी रोज़ रोज़ थोड़ा थोड़ा मारती है। वैसे अमूमन देखा गया है कि धरती पर जब भी कोई माहमारी फ़ैली है लाखों लोगों की बलि चढ़ी हैं। लेकिन इस बार की माहमारी में भूख से कोई ना मरे ये हमारा परम दायित्व होना चाहिए। सच्ची सेवा मानव सेवा, बाक़ी सब तो ढोंग है, छलावा है।

उम्मीद की जा सकती है कुछ महीनों के बाद सब कुछ पहले की भांति सामान्य हो जायेगा। ज़िंदगी की गाड़ी पटरियों पर दौड़ने लगेंगी। लेकिन तब तक फ़ासलों की खाई बहुत गहरी हो चुकी होगी। कोई किसी के क़रीब आने से भी डरेगा। लोग अपने स्वार्थ के चलते चाहते थे कि उनकी दुनिया सीमित हो। वे फले फूले, भले दुनिया भाड़ में ही क्यों ना जाये। कोरोना ने इतना सीमित कर दिया कि अब कोई किसी से गले ना मिलेगा तपाक से।

वैसे प्रधानमंत्री जी के लॉक डाऊन किये जाने के आदेश के बाद से ही देश की लगभग सारी समस्याएं ख़त्म हो चुकी हैं। इससे ये साबित होता है कि ढेरों समस्याओं को हम बेवज़ह जन्म देते हैं वास्तविकता में समस्याएं कभी इतनी जटिल नहीं होती हैं। हम विकास या प्रगति करने की बजाय समस्याओं को द्रोपदी की चीर की तरह खींचते रहते हैं।

एक निवेदन भारत सरकार से कि जिस तरह सरकार ने सेना को अस्त्र शस्त्र देकर सीमा पर मुस्तैद किया है उसी तरह हमारे देश के डॉक्टर, नर्स, लेबोरेटरी तकनीशियन, तकनीकी एवं नॉन तकनीकी वर्ग के सभी कार्मिक, पुलिस, सफ़ाईकर्मियों एवं वे सभी लोग को अपने घर से बाहर केवल इसलिए हैं कि देश में घर के भीतर बैठे लोग सुरक्षित रह सकें। ऐसे सभी लोगों को कोरोनो से बचाव से संबंधित सभी पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट किट उपलब्ध करावें। ताकि वे अपने कार्यों को बेहतर तरीक़े से संपादित कर सकें।

तस्वीर में जो व्यक्ति दिखाई दे रहे हैं। इनकी सहमति के पश्चात ही इनकी ये तस्वीर खींची गई है। कोरोना से बचाव के लिए इन्होंने नॉन वोवन केरी बैग लगा रखा है।

मिलकर बोये थे सब ने बीज़ काँटों के
वृक्ष बनकर वे आज भला फूल दें कैसे ?
#Corona #Covid19

#झूठ #धोखा #लालच #स्वार्थ #अनीति #पाप #कुकर्म #हिंसा #जीवहत्या

~ मनीष शर्मा

Sunday, 4 August 2019

दोस्त, मिले तो फिर बिछड़े ना।

या रब्बा, या तो दोस्त मिले ना
गर, मिले तो फिर बिछड़े ना

आज के दिन तुम बहुत याद आते हो। तुम्हें भुला पाना नामुमकिन है "रवि"। तुम्हारे जैसा सरल इंसान मैंने तुम्हारे बाद आज तक कभी किसी में नहीं पाया। दोस्ती क्या होती है ये मुझे तुमने सिखलाया।

ग्यारह साल पहले तुम्हारे एक रोड़ एक्सीडेंट में दुनिया से चले जाने के बाद मुझे पेशेवर दोस्त तो बहुत मिले, लेकिन तुम्हारे जैसा सच्चा, निःस्वार्थ दोस्त कभी कहीं नहीं मिला। तुम मेरे पहले और अंतिम मित्र थे।

बचपन से शुरू हुआ सफ़र ज़वानी की दहलीज़ पर पहुंचते ही ख़त्म कर तुम मुझे हमेशा के लिए तन्हा छोड़कर चले गए। तुम्हारे चले जाने का मलाल मुझे ताउम्र रहेगा मित्र।

मोहल्ले की एक ही गली में रहते थे हम दोनों। साथ खेलते थे, साथ स्कूल जाते थे। रवि सैन पढ़ाई में होशियार था और मैं कमज़ोर। मुझे नहीं आने वाले सवालों के ज़वाब भी रवि के पास हुआ करते थे। यहाँ तक कि एक तकनीकी कोर्स भी हमने साथ किया। हम दोनों साइकिल से रोज़ तीन से चार किलोमीटर सवेरे इंस्टिट्यूट जाते और शाम को वापिस आते। शाम को आने के बाद वो कुछ देर मेरे घर रुकता और टीवी पर एक तक फिल्में देखता। उसे फिल्मों का बहुत शौक था। फ़िल्म अगर सन्नी देओल की हो तो देर रात तक मेरे ही घर रुकता। यहाँ तक कि स्टील के चार खानो वाले एक ही टिफ़िन में हमारा खाना डाला जाता था, खाना भी साथ ही खाते थे। मेरे कोई सगा भाई-बहन नहीं हैं। इकलौती संतान हूँ मैं अपने माता पिता की। लेकिन रवि मेरे लिए दोस्त नहीं सगे भाई से भी बढ़कर था।

#FriendshipDay

~ मनीष शर्मा

Wednesday, 3 July 2019

फ़िल्म क़बीर सिंह की समीक्षा।


फ़िल्म क़बीर सिंह की समीक्षा मेरी क़लम से...

फ़िल्म क़बीर सिंह की क़ामयाबी ने ये साबित कर दिया कि भारतीय जनता आज भी सिनेमा के पर्दे पर भावनाओं (Emotions) का सैलाब देखना चाहती है, नफ़रत और हिंसा नहीं।

बात की जाए फ़िल्म के संगीत की तो फ़िल्म का दिलकश संगीत फ़िल्म की सबसे बड़ी ताक़त हैं। सारे गीत कर्णप्रिय हैं। कुछ गीत जुबाँ पर बड़ी आसानी से चढ़ते हैं जिनमें बेख़याली और तुझे कितना चाहने लगे हम प्रमुख हैं

फ़िल्म में क़बीर सिंह का क़िरदार सख़्त और गुस्सैल है लेकिन क़िरदार का दूसरा पहलू ये भी है कि क़बीर सिंह प्रेम से लबरेज़ है। इतने लबरेज़ कि फ़िल्म के पहले हॉफ तक क़बीर सिंह और प्रीति को अपने आस पास की दुनिया नज़र ही नहीं आती। ना उन्हें सुबह की ख़बर होती है ना ही शाम का इल्म। बस एक दूसरे के प्यार में सतह तक डूबे नज़र आते हैं। लेकिन अपने गुस्से के चलते एक दिन क़बीर सिंह अपनी प्रेयसी प्रीति को खो बैठते हैं। उसकी शादी किसी और से हो जाती हैं। लेकिन क़बीर सिंह का अपने दोस्त से एक सवाल कि क्या शादी में इतनी ताक़त होती है जो प्रीति अब लौटकर वापिस मेरे पास नहीं आ सकती। शादी के बंधन की मजबूती को दर्शाता है।

दूसरे हॉफ में क़बीर सिंह प्यार में नाकामी और प्रीति को खो देने के ग़म में ख़ुद को नशे में झोंक देते हैं। सिगरेट से शुरू हुआ नशा शराब तक पहुँचता है और शराब से शुरू हुआ नशा ड्रग्स तक। नशा जितना बढ़ता है क़बीर सिंह की मोहब्बत प्रीति से दिन ब दिन उतनी ही बढ़ती चली जाती है साथ ही प्रीति से बिछड़ने का ग़म भी, लेकिन यहाँ एक बात ग़ौर किये जाने की ये है कि क़बीर सिंह को प्रीति से बेतहाशा मोहब्बत है लेकिन किसी और से शारीरिक संबंध बनाने से क़बीर सिंह पीछे नहीं हटते। ये अलग बात है कि कुछ कारणवश संबंध बन नहीं पाते। क़बीर सिंह ज़िस्म की ज़रूरत के आगे बेबस नज़र आते है जहाँ ये ख़्याल जहन से छूट जाता है कि उनका दिल प्रीति के पास है। वैसे इस दौर का युवा बिल्कुल क़बीर सिंह की तरह दिल और ज़िस्म के बीच की जद्दोजहद में नहीं पड़ता। वो सही और ग़लत का चुनाव अपने विवेक से करता है। दुनिया जिसे ग़लत कहती वो उसे सही कहता है।

कुछ बरस पहले तक रोमांस दीवारों, पर्दों और हदों का मोहताज़ हुआ करता था। लेकिन आज का युवा क़बीर सिंह की तरह अपनी प्रेयसी के साथ रोमांस करते वक़्त ये अपने इर्द गिर्द ये नहीं देखता कि उसे कितनी नज़रें घूर रही हैं। वो क़बीर सिंह की तरह ये भी नहीं देखता कि चलती हुई मोटरसाइकिल पर चुम्बन लेते हुए गिर जाने से कुछ चोट ख़रोंच भी आ सकती है या दोनों की हड्डियाँ भी टूट सकती है वैसे मोटरसाइकिल पर चुम्बन लेने को लेकर कोई सख़्त क़ानून अब तक नहीं बना है। जब तक कोई क़ानून नहीं बन जाता प्रेमी प्रेयसी ऐसा कर सकते हैं।

क़बीर सिंह की दादी फ़िल्म में बहुत गहरा प्रभाव छोड़ती हैं। यूँ तो उनकी कही हर एक बात सीधे दिल को छूती है लेकिन उनकी एक बात छाप छोड़ जाती है कि जब हम किसी से बेहद प्यार करते है और वो इंसान दुनिया छोड़कर हमेशा के लिए चला जाता है तो मन को समझाया जा सकता है कि अब वो इंसान इस दुनिया में नहीं है, वो कभी लौटकर नहीं आयेगा। लेकिन जिस इंसान से हम बेहद प्यार करते है वो ज़िंदा हो और हम उससे कभी मिल नहीं सकते, उसे पा नहीं सकते। इस स्थिति में इंसान ज़िंदा लाश समान है।

क़बीर सिंह फ़िल्म का अंत सुखद है जिसमें दोनों के परिवार उन्हें और उनके प्यार को स्वीकार कर लेते हैं। उसी तरह मेरा मानना है कि वैसे भी दुनिया थोड़े से समय के बाद कभी कुछ नहीं कहती। ये हम ही हैं जो क़यास लगाते हैं कि दुनिया हमारे बारे में क्या सोचती होगी। वैसे दुनिया के मंत्र का प्रभाव उन्हीं लोगों पर असर करता है जो उसे अपने ऊपर हावी होने देते हैं।

आज का युवा बिंदास जीना चाहता हैं। ज़िंदगी में बिना किसी की दख़लअंदाज़ी के। उड़ना चाहता है, गिरना चाहता है फिर संभलना चाहता है।

जिस तरह ठहरा हुआ पानी कभी शोर नहीं करता, जब तक कि उसमें कोई कंकर ना फ़ेंक दे। लोगों से उसकी भी यही अपेक्षा रहती है कि ख़ामोशी से बह रही ज़िंदगी के तालाब में कभी कोई कंकर ना फ़ेंके। अगर फिर भी कोई कंकर फ़ेंककर छींटे उड़ा भी दे तो उसे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। क्योंकि ज़माने में इश्क़ के परिंदो ने प्यार करने के तौर तरीक़े अब क़बीर सिंह की तरह बदल लिए हैं।

~ मनीष शर्मा

#KabirSingh is 200 Not Out 🔥🔥🔥... Hits double century at the BO, but shows no signs of fatigue... [Week 2] Fri 12.21 cr, Sat 17.10 cr, Sun 17.84 cr, Mon 9.07 cr, Tue 8.31 cr, Wed 7.53 cr. Total: ₹ 206.48 cr. India biz. Blockbuster.

#KabirSingh benchmarks...
Crossed ₹ 50 cr: Day 3
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₹ 200 cr: Day 13
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Days taken to reach ₹ 200 cr... 2019 releases...

⭐️ #KabirSingh: Day 13
⭐️ #Bharat: Day 14
⭐️ #Uri: Day 28
India biz.
Data source : Taran Adarsh


Monday, 31 December 2018

नववर्ष अभिनंदन

छात्रसंघ राजकीय पी. जी. महाविद्यालय, बाड़मेर अंतरप्रांतीय कुमार साहित्य परिषद एवं उजास संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में नववर्ष पर आयोजित कवि सम्मेलन में कविता पाठ करते हुए।








Sunday, 30 September 2018

आधुनिक भारत।

आधुनिक भारत।

भारत इस वक़्त आर्थिक संकट से गुज़र रहा है। मगर सरकार का कहना है कि ऐसा कुछ नहीं हैं। अगर ऐसा कुछ नहीं हैं तो डॉलर की तुलना में रुपये की क़ीमत क्यों गिर रही हैं ? पेट्रोल - डीजल से लेकर खाने पीने की सभी चीज़ों के भाव आसमान क्यों छू रहे हैं ? तो फिर क्यों कुछ शहरों में लोग इस आर्थिक संकट की वज़ह से शहर से अपने गाँवों का रूख़ कर रहे हैं ?

सरकार और विपक्ष अपनी ग़ौरव बख़ान गाथायें गा रही हैं। जिन मुद्दों पर सरकार और विपक्ष को मंथन करने की आवश्यकता है उन मुद्दों पर इनका ध्यान कभी नहीं जाता। जैसे - जनसंख्या वृद्धि, भुखमरी, स्वास्थ्य, कुपोषण, धर्म, जातिवाद, आरक्षण और महिला सुरक्षा इत्यादि।

रोज़गार के अवसर इतने कम हो चुके हैं कि उच्च शिक्षा वाले लोग निम्न शिक्षा वाले लोगों के रोज़गार का चुनाव करने लगे हैं। निम्न शिक्षा वाले लोग हमाल मजदूरी करने पर मजबूर हैं।

सरकार पोषण पर आजकल बहुत सारे कार्यक्रम चला रही हैं। मगर दूर तक पोषण किसी गरीब के शरीर में नज़र नहीं आता। पोषण से जुड़ी बातें किताबी रह गई हैं। यहाँ तक कि फुटपाथ पर रहने वाले लोगों के लिए सूखी रोटी ही पोषण हैं। वे जैसे तैसे एक वक्त की रोटी का जुगाड़ कर लेते है लेकिन शाम को उसका भी जुगाड़ होगा या नहीं इस बात की कोई गारंटी नहीं।

71 साल पहले मिली आज़ादी की क़ीमत अब सब भुला चुके हैं। वैसे ग़ुलामी करवाने वालों ने सिर्फ़ चेहरा बदला हैं। पहले गोरे थे, अब अपने ही रंग के हैं। ग़ुलाम हम पहले भी थे ग़ुलाम हम आज भी हैं। अगर ग़ुलाम नहीं है तो चुनाव हो जाने के बाद जिस प्रत्याशी को हम चुनते है। उसके द्वारा जनहित के कार्य सही प्रकार से नहीं किये जाने पर जनता मूक दर्शक की भाँति देखने के सिवाय क्या कर सकती है ? क्या उसे 5 साल से पहले बदल पाने का अधिकार जनता के पास हैं ?

जनता सच में मजबूर हैं और भारत से विकास कोसों दूर।

तस्वीर स्त्रोत : गूगल

~ मनीष शर्मा

Tuesday, 18 September 2018

लेखक तन्हा।

अगर आपका लेखन से दूर तलक़ कोई वास्ता नहीं है तो कतई सच्चे प्यार के चक्कर में ना पड़ें। सिर्फ़ पैसा कमायें। लेखकों को प्यार करना इसलिए जरूरी होता है कि दिल लगाने से लेकर दिल तुड़वाने तक लगभग सभी तरह के खुशियाँ और ग़म भरे गीत, शायरी, गज़ल, नज़्म, कवितायें और कहानियाँ लिखनी होतीं हैं।
वैसे अंत में वही सच्चा प्यार झूठा निकलता हैं और लेखक तन्हा।

~ मनीष शर्मा

Monday, 10 September 2018

“मैं”

हमारे ठाकुर जी की एक लघु कथा

“मैं”

मैं, ठाकुर जी और मेरी मम्मी जी हर शाम स्टेडियम जाते हैं। मैं जॉगिंग के लिए, ठाकुर जी झूले खाने, घूमने के लिए और मेरी मम्मी जी ठाकुर जी का ख़्याल रखने के लिए।

कल मेरी जॉगिंग पूरी हो जाने के बाद मैं ठाकुर जी के पास आया। ठाकुर जी मिट्टी में बैठे खेल रहे थे। ठाकुर जी जहाँ बैठे थे वहां से दस क़दम की दूरी पर दो नंग धड़ंग बच्चे जिनकी उम्र ठाकुर जी की उम्र से तक़रीबन पाँच साल ज़्यादा रही होगी दोनों कुश्ती कर रहे थे और मिट्टी में खेलते खेलते भौंहें ऊपर करके कुश्ती कर रहे उन बच्चों को ठाकुर जी बार बार देख रहे थे।

‘वैसे ठाकुर जी को कुश्ती का बड़ा शौक़ है। हर रोज़ मेरे और ठाकुर जी के बीच पलँग पर कुश्ती होती हैं।’ इसी कुश्ती के दरम्यां ठाकुर जी की मम्मी जी को बस एक ही फ़िक्र कि ठाकुर जी और आप पलंग तोड़ दोगे।

मैं उन कुश्ती कर रहे बच्चों के पास गया और एक बच्चे से बोला क्या आप ठाकुर जी से कुश्ती करेंगें। बच्चा बोला हाँ जी।

मग़र मैंने बच्चे के कान में धीरे से फुसफुसाते हुए कहा कि आपको ठाकुर जी से हारना है। बच्चा सहजता से बोला ‘जी’ मैं हारने को तैयार हूँ।

इतने में ठाकुर जी से मेरी मम्मी जी का एक सवाल - ठाकुर जी आपको क्या पसंद है ? पढ़ाई या खेलना ? ठाकुर जी का जवाब दोनों ही नहीं। मुझे तो बच्चों से लड़ना पसंद हैं।

कुश्ती का पहला चरण शुरू हुआ ठाकुर जी ने ज़ोर आज़माया और उस बच्चे को हरा दिया। क्रमशः दूसरे, तीसरे और चौथे चरण में भी ऐसा ही हुआ। ठाकुर जी ने उस बच्चे को हर बार हरा दिया। ठाकुर जी बहुत ख़ुश थे और ज़ोर ज़ोर से हंस रहे थे। मैं ठाकुर जी से भी ज़्यादा ख़ुश था। ऐसी ख़ुशी मुझे कभी मेरे जीतने पर भी नहीं हुई। मग़र मुझे ठाकुर जी की उस वास्तविक जीत का इन्तज़ार हमेशा रहेगा जो उनके पुरुषार्थ के दम पर होगी। ऐसा एक दिन ज़रूर आयेगा, मुझे पूरा यक़ीन हैं।

हम लोग आज भी स्टेडियम गये। स्टेडियम पहुंचते ही मैं जॉगिंग करने लगा और ठाकुर जी खेलने लग गये।

कुछ देर बाद मैं ठाकुर जी के पास आया तो ठाकुर जी की आँखों में उन बच्चों का इंतज़ार साफ़ नज़र आ रहा था।

एकाएक ठाकुर जी ने सवाल किया पापाजी आज वो बच्चे नहीं आये ?

मैंने ठाकुर जी से कहा - हाँ आज वो बच्चे नहीं आये। आपने उन्हें कल कुश्ती में बुरी तरह से हरा दिया इसीलिए आज वे डर के मारे नहीं आये। ये सुन ठाकुर जी के चेहरे पर मंद मंद मुस्कुराहट आयी और अपनी भुजा को उठा अपनी ताक़त का प्रदर्शन करने लगे और दाँत भींचते हुए कहने लगे ‘देखा पापा जी में कितना ताक़तवर हूँ।' मुझे और मेरी मम्मी जी को ज़ोरों की हंसी आ रही थी।

सारांश - बड़े तो बड़े छोटे बच्चे भी अहंकार से भरे होते हैं। दूसरे शब्दों में यूँ कहूँ की हर एक शख्स तारीफ़ का मोहताज़ हैं। इंसान की गई सही तारीफ़ उसे शिखर पर भी ले जा सकती है तो झूठी उसे हाशिये पर भी ला सकती हैं। मुझे ठाकुर जी को इसी अहंकार से बचाये रखते हुए सही तारीफ़ का हक़दार बनाये रखने के साथ साथ एक अच्छा इंसान भी बनाये रखने की पूरी कोशिश करनी हैं।

क्योंकि अहंकार इंसान की इंसानियत को ज़िंदा निगल जाती हैं। भगवान ठाकुर जी को हमेशा हर बुरी नज़र से बचाये रखे।

तस्वीर कुश्ती से ठीक पहले की।

~ मनीष शर्मा


Tuesday, 3 July 2018

फ़िल्म संजू की समीक्षा मेरी कलम से।

ज़िंदगी को अपनी शर्तों पर जिया जाना चाहिए। मगर शर्ते जब कोई और तय कर दे तो फिर रास्ते बदल लेना ही ठीक रहता हैं।

कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना।

मैंने दो दिन पहले फ़िल्म संजू देखी। इस फ़िल्म के ट्रेलर ने मन में पहले से ही उत्पात मचा रखा था। राजकुमार जी हिरानी ने ट्रेलर में ही फ़िल्म की तस्वीर लगभग साफ़ कर दी थी। फ़िल्म के विषय को जिस इंसान पर केन्द्रित किया गया। उस इंसान की ज़िंदगी किसी आम या ख़ास आदमी या औरत द्वारा जी पाना तो दूर की बात है उसके बारे में सोचना भी भारत जैसे देश में बहुत मुश्किल होगा।

फ़िल्म संजू को हीरो बनाती है या विलेन इस पर विभिन्न मत हो सकते हैं। कोई कहेगा संजू के बारे में आधा सत्य दिखाया गया ताकि फ़िल्म को कॉमर्शियल बनाया जा सके। तो कोई कहेगा कि फ़िल्म में वो सब कुछ नहीं दिखाया जाना चाहिए जिससे कि संजू की छवि जनता में विलेन की तरह उभरे। तो कोई कहेगा कि संजू को एक हीरो की तरह पर्दे पर उतारा गया।

वैसे फ़िल्म के मुताबिख़ संजू ने पहली बार ड्रग्स इसलिए ली कि वो पिता से ख़फ़ा थे। दूसरी बार इसलिए कि उनकी माँ को कैंसर हो चुका था और तीसरी बार तक वो आदतन नशेड़ी बन चुके थे।

सुनिल दत्त साहब एक महान इंसान थे। फ़िल्म देखने के बाद मेरी नज़र में उनकी इज़्ज़त और भी बढ़ गयी। एक पिता ने अपने बच्चे के लिए कितना संघर्ष किया ये पर्दे पर दिखाए जाने से पहले शायद ही किसी ने जाना हो। लेकिन यहाँ ग़ौर किये जाने वाली बात ये है कि संजू उस रास्ते पर क्यों चल पड़े जिस रास्ते की मंज़िल एक वीरान उजड़ी इमारत सी सिर्फ़ और सिर्फ पश्चाताप लिए मिलती हैं। अक़्सर भारत में एक पिता और पुत्र के बीच वो रिश्ता नहीं बन पाता जिसे दोस्ती का नाम दिया जा सके। शायद इसलिए भी नहीं कि एक पिता को ये भय रहता हो कि कहीं उसका लाड प्यार उसके पुत्र को बिगाड़ ना दे। लेकिन फ़ासले भी अलगाव लेकर के आते हैं ये बात संजू की कहानी में देखने को मिलती हैं। अगर पिता पुत्र के बीच रिश्ता सरल और सहज होता तो शुरुआती वक़्त में ही संजू द्वारा चुने गए कांटों भरे रास्ते को उनके पिता फूलों भरे रास्ते में बदल देते। जहाँ दूर दूर तक कोई भटकाव ना होता।

काश संजू जितना बेबाक़ भारत का हर एक इंसान होता। जो अपनी ज़िंदगी के वो राज़ भी बड़ी आसानी से खोल देता जिसे इंसान अपने सीने में दफ़न कर चुका होता है। दफ़न इसलिए कि कहीं राज़ ने कफ़न उघाड़ लिया तो ज़िंदगी ना जाने कितनी तबाहियाँ लिए हुए आ सकती हैं। अमूमन इस तरह के राज़ एक पुरुष की अपेक्षा एक महिला की ज़िंदगी में ज़लज़ला लाती हैं। क्यों कि हर आदमी का अतीत अच्छा और बुरा दोनों तरह का होता है।

फ़िल्म संजू के एक संवाद में अनुष्का शर्मा रणबीर कपूर से पूछती है - "संजू अपनी बीवी के अलावा तुम कितनी औरतों के साथ सोये हो ? संजू कहते हैं - प्रोस्टिट्यूटूटस को गिनु या उनको अलग। नहीं उनको अलग। नहीं अलग रखता हूँ। नहीं 308 तक याद हैं। चलो आप शिफ्टिंग के लिए 350 लिख लो। तो क्या इसका मतलब ये समझा जाये कि संजू भारतीय सभ्यतानुसार चरित्रहीन रहे ? ज़्यादातर लोगों का जवाब होगा हाँ। हाँ इसलिए कि संजू ने ये सहज स्वीकार कर लिया कि उसके संबंध कईं महिलाओं के साथ रहे। ये अलग बात है कि संजू से भी दो क़दम आगे रहे लोगों का दामन आज भी पाक है। क्योंकि उन्होंने वो सब करते हुए एक पर्दे की आड़ ली।

या फिर बात अगर की जाये क्यूबा के क्रांतिवीर फिदेल कास्त्रो की तो उन्होंने भी संजू की तरह पूरी दुनिया के सामने ये सहज़ स्वीकार किया कि उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी में अनुमानित 35000 महिलाओं के साथ शारीरिक संबंध बनाये। लेकिन उनकी छवि दागदार नहीं हैं क्यों कि वो पाश्चात्य संस्कृति से हैं जिन्हें हम अक़्सर चरित्रहीन कहकर टाल देते हैं। वैसे जिसे पाया ना जा सके उसमें नुक़्स निकालकर उसे छोड़ देना सबसे बेहतर उपाय तलाशा है हमने।

कहीं ना कहीं संजू की ज़िंदगी में जो बदनुमा दाग ड्रग्स और बंदूक का रहा। वो दर्शाता है कि एक नकारा सिस्टम आदमी को वो बनने पर मजबूर कर देता है जो वो कभी नहीं बनना चाहता। अपने पिता और परिवार को जान से मारने की मिल रही धमकियों पर सिस्टम का कोई एक्शन नहीं हुआ तो बंदूक से पाला पड़ गया। ध्यान दिलाना चाहूँगा कि यहाँ मैं संजू का उसके परिवार के लिए जोश और जुनून में लिया गया फ़ैसला तात्पर्य कि आत्मसुरक्षा के लिए बंदूक लिए जाने का समर्थन नहीं कर रहा। लेकिन सिस्टम अगर सही काम करता तो संजू का कभी जेल से भी वास्ता ना पड़ता।

इतने बुरे दौर से गुज़र कर लौट आना किसी भी इंसान के लिए मुनासिब नहीं होता। मगर भूत, वर्तमान और भविष्य की पेशमपेश में फंसे संजू ने आख़िर में मैदान फ़तह किया।

फ़िल्म की समीक्षा लिखते हुए अंत में मैं सिर्फ़ इतना कहना चाहूँगा कि एक हारे हुए इंसान के जीतने की कहानी हैं संजू। फ़िल्म हर एक कसौटी पर बेहतरीन हैं। फ़िल्म का हर एक कलाकार ने अपने क़िरदार में जान फूंक दी हैं। डायरेक्टर का विज़न उनकी पिछली फ़िल्म की भाँति बिल्कुल सही और सटीक है। किसी भी जगह फ़िल्म ढीली दिखाई नहीं पड़ती। फ़िल्म एक सबसे अच्छा संदेश ये देती है कि हर इंसान परिणाम से वाकिफ़ होता है फिर भी वो कर्म कर बैठता जो अंत में उसे आत्मग्लानि से भर देता हैं। इसीलिए ये 
हमेशा याद रखा जाना ज़रूरी है कि रिश्तों में कभी वो दरार ना आने पाये जिसे कभी भी भरा ना जा सके। या जिनके कारण अपने अपनों से इतने दूर चले जायें कि वापसी मुश्किल बहुत मुश्किल हो जाये। या फिर वापसी करते हुए सिर्फ़ और सिर्फ़ पश्चाताप के अलावा कुछ ना हों।

एक बात और येे कि हम किसी भी अहंकारवश बहुत सी बातें कभी किसी से कह नहीं पाते। फिर वो बात चाहे किसी से माफ़ी माँगने की हो या प्यार ज़ाहिर किये जाने की। जैसा कि फ़िल्म में दिखाया गया है कि संजय दत्त भी सुनिल दत्त साहब को वो सब कहना चाहते थे जो बरसों से उनके दिल में दबा था। मगर कह पाने से पहले ही दत्त साहब संजय दत्त को छोड़कर हमेशा हमेशा के लिए भगवान के पास चले जाते हैं। इससे पहले कि हमारे अपने किसी दिन दूर चले जायें एक बार जादू की झप्पी ले ली जाये और ज़िंदगी को काश कहने से बचा लिया जाये। 

#ManishSharma

Sunday, 8 April 2018

सौ सालों के बाद हमारे देश भारत में सब कुछ सही हो जायेगा।

सौ सालों के बाद हमारे देश भारत में सब कुछ सही हो जायेगा। कुछ भी अस्त व्यस्त नहीं होगा। आर्थिक, धार्मिक और नैतिक कोई द्वंद नहीं होगा। कोई बेरोजग़ार नहीं होगा। किसी को आरक्षण की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी। कहीं कोई लाईन नहीं होगी। सभी के पास तरक्क़ी के पर्याप्त अवसर होंगे। हर व्यक्ति साठ वर्ष की आयु में भी तीस वर्ष सा नज़र आयेगा। कोई गला काट आगे बढ़ने जैसी प्रतिस्पर्धा नहीं होगी कोई चोरी चकारी, लूटपाट नहीं होगी। सभी को ज़रूरत की वस्तुऐं उपलब्ध होंगी। एक वस्तु की ख़्वाहिश में चार वस्तुऐं हाज़िर होंगी। भूलवश कोई अपराध हो भी गया तो कानून व्यवस्था ऐसी कि हाथों हाथ न्याय और दोषी को कठोर दंड।

शिक्षा इतनी बेहतरीन होगी कि अच्छी पढ़ाई लिखाई करके बच्चे अपनी पसंद के व्यवसाय का चुनाव कर पायेंगे और देश के एक ज़िम्मेदार नागरिक बन पायेंगे।

स्वास्थ्य सेवायें ऐसी कि अस्पताल में एक डॉक्टर गिनती के मरीज़ देखेगा। एक नर्स या कंपाउंडर सिर्फ़ एक ही मरीज़ के लिए होगा। दवाइयाँ और खून जाँच की गुणवत्ता ऐसी कि एक बार के ट्रीटमेंट से ही मरीज़ ठीक हो जायेगा।

परिवहन सेवायें ऐसी होंगी कि हर व्यक्ति सिर्फ़ अपनी सीट पर बैठेगा। वर्तमान की तरह ऐसा नहीं कि चार लोगों की सीट पर सात लोग बैठें हो या दर्जनों लोग सीट मिलने के इंतजार में खड़े हों। कोई सीट के लिए झगड़ेगा नहीं। ना ही ऐसी स्थिति होगी कि किसी को फलाँ स्टेशन पर उतरना हो लेकिन भीड़ का दबाव उसे उसके गन्तव्य स्थान से पहले ही उतार दे।

महिलायें पूरी तरह से महफ़ूज़ होंगी। बलात्कार पर पूर्णतया अंकुश लग जायेगा। अग़र कहीं कोई वारदात हो भी जाती है तो तुरंत प्रभाव से पुलिस पहुंच जायेगी। अपराधी को ऐसी सज़ा दी जायेगी कि भविष्य में अपराध का ख़्याल भी किसी अपराधी के जेहन से धूमिल हो जायेगा।

रास्तों में कभी कोई भीख मांगता हुआ नज़र नहीं आयेगा। ना ही कभी कोई झुग्गी झोंपड़ी नज़र आयेगी। कहीं कोई शोषित नहीं होगा।

वर्तमान में 2 जी से 4 जी तक के सफ़र में बरसों लगे। जिसमें भी देश की बहुत बड़ी आबादी सीधी 2 जी से 4 जी में पहुँची है। वो आबादी 3 जी स्पीड से मेहरूम रही। लेकिन सौ साल बाद संचार व्यवस्था हमेशा दुरुस्त और बेहतरीन होगी।

जिस बैलेंस डायट की बातें अक़्सर हमने किताबों में पढ़ी है। वो बैलेंस डायट लोगों की थाली में होगी। फिर 1 सब्जी और कुछ चपातियों से पेट नहीं भरना होगा।

ईमानदार लोगों के लिए ये धरती जन्नत बन जायेगी और बेईमानों के लिए दोज़ख़।

देश को वीटो पावर भी मिल जायेगा। देश विकाशशील ना रहकर के विकसित देशों में शामिल हो जायेगा। विकास की एक ऐसी गंगा बहेगी जिसमें ख़ुशहाली ही ख़ुशहाली नज़र आयेगी।

सौ सालों के बाद हमारे देश भारत में सब कुछ सही हो जायेगा "अग़र जनसंख्यावृद्धि पर एक बेहतरीन सरकार लग़ाम लगा लेती हैं तो..."

~ मनीष शर्मा

Saturday, 31 December 2016

नववर्ष नयी सी आभायें बिखेरने आया हैं।

Happy New Year

नववर्ष नयी सी आभायें बिखेरने आया हैं
जीवन में उमंग, तरंग, आनंद भरने आया हैं
नवचेतना का नव संचार करने आया हैं
जीवन मूल्यों को नव आधार देने आया हैं
जीवन के सुनहरे से केनवास पर
ख़ुशहाली की नव तस्वीर बनाने आया हैं
गत वर्ष जिन रंगों से अछूता रहा जीवन
मुट्ठी में भर उन रंगों को उछालने आया हैं।

#ManishSharma

Saturday, 12 November 2016

ताउम्र पैसों के इर्द गिर्द घूमती रही कमबख़्त ज़िंदगी...

ताउम्र पैसों के इर्द गिर्द

घूमती रही कमबख़्त ज़िंदगी

रिश्तों की परछाईयाँ

अंधेरों में ढूँढती रही ज़िंदगी

पैसा हाथ से फ़िसला

रिश्ते लकीरों से गिरे

फ़िर भी गुरेज़ से ऊँचा

मस्तक किये भागती रही ज़िंदगी

बचपन में खेल खिलौनों से

जी भर मन बहलाया

युवावस्था से मरणासन्न तक

पैसों से ख़ूब खेलती रही ज़िंदगी

पलकें ख़्वाहिशों का बोझ ढोये

सफ़र तय करती रही मीलों का

बहरूपिये पैसे संग

आँख मिचौली करती रही ज़िंदगी

ताउम्र पैसों के इर्द गिर्द

घूमती रही कमबख़्त ज़िंदगी

रिश्तों की परछाईयाँ

अंधेरों में ढूँढती रही ज़िंदगी !!!

#ManishSharma

Friday, 30 September 2016

सलाम भारतीय सेना

मुझे बड़ी हैरानगी होती हैं जब अपनी रोटियाँ सेंकने के लिये कोई मुल्क़, किसी मुल्क़ में बेपनाह आतंकवाद को पनपने देता हैं। मैं बात कर रहा चीन की जो जानता हैं कि पाकिस्तान आतंकवाद को पालते हुए पूरे विश्व में आतंकवाद फैला रहा हैं और भारत इससे सबसे ज्यादा प्रभावित हैं फिर भी चीन अपने हथियार और रसद सामग्री पाकिस्तान को बेचने के चलते अपना स्वार्थ साध रहा हैं। मैं अभी कुछ देर पहले टीवी में देख रहा था जिसमें पाकिस्तान के किसी टीवी चैनल पर भारत द्वारा किये गए सर्जीकल स्ट्राइक पर चर्चा चल रही थी। टीवी चैनल के संवाददाता खुले में कह रहे थे कि भारत अगर दाऊद इब्राहिम को मारना चाहता है तो दाऊद पकिस्तान में नहीं हैं और रही बात "हाफ़िज़ सईद" की तो उनके फियादीन इतनी तादाद में हैं कि भारत की र से आने वाले किसी भी इंसान चाहे वो सैनिक हो या कोई भी शख़्स उसकी टाँगे तोड़ दी जायेगी, उसकी जान को भी ख़तरा होगा। अब मुझे समझ में ये नहीं आ रहा कि पाकिस्तान के समर्थन में वहाँ की जनता हैं भी या नहीं क्यों की वहाँ की बहुत बड़ी आबादी आज भी मूलभूत आवश्यकताओं से जूझ रही हैं। पेट में रोटी नहीं बात ज़ेहाद की, ये बात बड़ी बेमानी सी लगती हैं। पाकिस्तान के हुक्मरान उनकी जनता की मूलभूत आवश्यकताओं तक तो पहुँच नहीं पा रहे हैं और बात कर रहे भारत से कश्मीर को लेने की। अब कोई पाकिस्तान से ये पूछे की जो तुम्हारे पास हैं वो तुमसे संभाला नहीं जा रहा। तो कश्मीर लेने की ख़्वाहिश रखते हुए इसे भी भूखा नंगा बनाना चाहते हो। पाकिस्तान को ख़ुद की ज़मीन को चमन बनाने या ज़न्नत बना लेने पर मंथन करना चाहिये। पाकिस्तान की आवाम ने अग़र उनके ही मुल्क़ में बग़ावत का बिगुल एक स्वर में बजा दिया तो पाकिस्तान में गृह्क्रान्ति हो जायेगी और फ़िर कभी भी किसी भी मुल्क़ में आतंकवाद फैलाना तो दूर की बात पाकिस्तान आतंकवाद के बारे में सोच भी नहीं पायेगा। जय हिंद।

Monday, 15 August 2016

आज़ादी की एक भोर ऐसी भी होगी...

शरीर तो आज़ाद हो गये थे 1947 में

सोच आज भी इंतज़ार में हैं रिहाई के

विकार के सारे बादल छंट जायेंगे इक दिन

हर एक कोने में धूप छम से बिखर जायेगी

सारे भेद मिटा उस दिन हम इंसान बन जायेंगे

उस दिन सभी की थाली में रोटी होगी

किसी की भी आँखें नम ना होगी

जमीं पर प्रेम और वात्सल्य की बरखा होगी

आज़ादी की एक भोर ऐसी भी होगी

जाति, धर्म और मज़हब की आड़ में

ना किसी की कुटिया जलेगी

ना किसी की चिता सुलगेगी

ना कोई बेबस होके सूत भरेगा

ना ही कोई जीते जी रोज़ मरेगा

बहन बेटियाँ और बहुओं की

अस्मत तार तार ना होगी

सारा देश उनके घर सा होगा

और वो ख़ुद को महफूज़ समझेगी

आज़ादी की एक भोर ऐसी भी होगी

उस दिन जश्न ए आज़ादी सही मायनों में होगी !!!

#ManishSharma

Happy Independence Day

Sunday, 12 October 2014

जन्नत सिसक रहा है !!!

बाढ़ग्रस्त हैं गलियां सारी

विकट परिस्थितियाँ हुई हैं भारी

चीत्कार रहे हैं सारे कूचे

नम निगाहें इधर उधर

बस अपनों को ही ढूंढें

ग़म भारी है और दर्द हावी

हर ओर फैली भयावह त्रासदी

डल तबाह हो चुकी है

शिकरे सभी हुए तहस नहस

कोई तो देखो, कोई तो थामों

नम निगाहें मदद मांगे

उदास चेहरे भीतर झांके

कश्मीर (जन्नत) सिसक रहा है

अपने ज़ख्मों पर फफक रहा है

कश्मीर (जन्नत) सिसक रहा है

अपने ज़ख्मों पर फफक रहा है !!!

Poet : Manish Sharma

Sunday, 3 August 2014

दोस्त हो कोई...

यहाँ दोस्त तो
सभी है हमारे
दिल के क़रीब भी
होता कोई

लभों से कुछ ना
कहते उसे
नैनों की भाषा
समझता कोई

कुछ अपनी कहते
कुछ उसकी सुनते
बातें बेवजह यूँ ही
होती कोई

ख़ुशी में हँसते
ग़म में ग़मगीन होते
ऐसा कभी कहीं
अपना भी होता कोई

राज जो सीने में
दबे है हज़ारों
इन्हें जान पाता ऐसा
राजदार होता कोई

अब तक नहीं मिला
सच्चा दोस्त कोई
एक दिन जरूर मिलेगा
सच्चा प्यारा दोस्त कोई

Happy Friendship Day !!

Manish Sharma

Sunday, 24 November 2013

उठो और देश बुनो...



इन दिनों ’’राजनीति’’ का माहौल कॅाफी गर्म है हालाँ कि मैं हमेशा से ही इस मुद्दे पर अपनी राय रखने से बचता आया हूँ लेकिन मैं अपने आप को आखिर कब तक धोखा देते हुए सच कहने से बचता रहूँ, मेरे चाहने या ना चाहने से व्यवस्था में परिवर्तन हो ये सम्भव नहीं लेकिन व्यवस्था में परिवर्तन करने का प्रयास नहीं करने का दंश में जीवन पर्यतं नहीं सहना चाहता इसी लिए मन में चल रही कुछ संवेदनाओं को व्यक्त कर रहा हूँ।         
           ’’राजनीति’’ जाने कितनी सदियों से चली आ रही है ये राजनीति जिसका तात्पर्य होता है राज करने के लिए बनाए जाने वाली नीतियाँ लेकिन राज किस पर शायद जनता पर हालां कि इसका जवाब दिया जाना बेहद मुश्किल है, क्यों कि प्राचीन काल से ही चली आ रही इन नीतियों को देख कभी भी ऐसा नहीं लगा कि ये नीतियाँ जनकल्याणकारी रही हो, इन नीतियों से जनता का लाभ कम और राज करने वालों का लाभ शायद ज्यादा होता चला आया है, राजनीतिक पार्टीयों को उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ अधिकाधिक मतों से विजय प्राप्त कर सत्ता में बने रहना ही रह गया है। लेकिन आम नागरिक को जीवन यापन करने के लिए क्या मूलभूत आवश्यकताऐं होती हैं इससे शायद किसी भी राजनीतिक पार्टी को सरोकार नहीं।
       ये राजनीतिक पार्टीयाँ अगर थोड़ा बहुत कुछ कर भी देती हैं तो उसे आने वाले चुनावों में विकास का मुद्दा बनाकर के चुनाव लड़ती है। कई प्रकार के लुभावने वादे और जनकल्याणकारी योजनाओं के लाए जाने का आश्वासन देती है, और जनता इन वादों के पूरे होने का आश्वासन लेते हुए अपने मत का प्रयोग करती है, ये अलग बात है कि कौन सी पार्टी जीतने बाद में गिरगिट की भांति रंग बदलने वाली हैं। चुनाव के दौरान किसी भी पार्टी के किसी भी नेता से मिलना बहुत ही आसान होता है लेकिन सत्ता में आ जाने के बाद की स्थिति बिल्कुल इससे विपरीत होती है। निर्वाचन आयोग द्वारा प्रचार किया जाता है कि सही प्रत्याशी का चुनाव करते हुए अपने मत का प्रयोग अवश्य करें जिससे कि सही और ईमानदार उम्मीद्वार सत्ता में आ सके। लेकिन उस सही और ईमानदार प्रत्याशी को कहाँ ढूँढा जाये ये एक आम नागरिक के जहन् में चल रहे सवालों में से एक बहुत बड़ा सवाल होता हैं लेकिन इस सवाल का जवाब शायद किसी के पास नहीं होता।
           राजनीतिक पार्टीयों द्वारा टिकट का निर्धारण किस प्रकार से किया जाता हैं ये समीकरण भी बड़े उलझे हुए होते हैं, राजनीतिक पार्टीयाँ सिर्फ उन प्रत्याशियों को ही टिकट देती हैं जिनकी जीत निश्चित हो इसका निर्धारण या जातिगत आधार पर किया जाता हैं या फिर ऐसे उम्मीद्वारों को टिकिट दे दिया जाता है जो किसी ना किसी प्रकार की अपराधिक गतिविधियाँ जैसे बलात्कार, हत्या, भ्रष्टाचार, हिंसक प्रकरणों में ही क्यों ना लिप्त रहे हो। हमारे देश के राजनेता विदेशों में उत्पादन और विकास किये जाने वाली कई प्रकार की नई तकनीकों जैसे कृषि, इंजिनियरिगं, इत्यादि को देखने के सिलसिले में सरकारी खर्चे पर विदेश दौरे पर भी जाया करते है, वहाँ जाकर के उन तकनीकों को लाकर के हमारे देश में लागू करते है, लेकिन यही राजनेता हमारे देश में विकसित देशों की भांति कानून व्यवस्था, चुनाव प्रक्रिया लागू करवाने से क्यों कतराते हैं क्यों नहीं जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री को चुनाव करवाया जाता हैं, क्यों आर्थिक रूप से जनता पर चुनाव के बाद बेहाल कर दिया जाता हैं। अक्सर लोगों को चर्चा करते देखा जाता हैं कि हमारा देश अभी भी विकसित देशों की अपेक्षा बहुत पीछे है, मान भी लिया जाये कुछ चीज़ों में हम पीछे हैं लेकिन आगे लाने के प्रयास भी तो सही प्रकार से नहीं हुए हैं। क्यों आए दिन होती रहती है जातिगत हिंसा, उग्र तनाव क्या लाभ हैं इन सबसे, नुकसान की तो शायद सारी सीमाऐं लाघं देती होगीं ये जातिगत हिंसा। इन स्थितियों में क्या होता हैं गरीब और गरीब हुऐ जा रहा है और अमीर और भी ज्यादा अमीर।
           लोग देश में अमन चाहते है, शातिं चाहते है, खुशहाली चाहते हैं अगर ऐसा नहीं हैं तो क्या कभी किसी ने सुना है कि किसी ने कहा हो कि हमें युद्ध बेहद पसन्द है, शायद नहीं, स्कूलों में बच्चों को ज्ञान दिया जाता हैं, प्रेम सौहर्द और एका करके रहने की बातें सिखाई जाती है लेकिन लेकिन क्या ये सारी बातें किताबी होती हैं क्यों वास्तविकता तो इससे परे हैं, एक राजनीतिक पार्टी दूसरी राजनीतिक पार्टी को नीचा दिखाने का एक भी अवसर नही छोड़ती, अपनी प्रसंसा, दूसरे की कमियाँ, क्या यही रह गया है राजनीति में। अन्य देशों को मैत्रीय होने का संदेश दिया जाता हैं लेकिन हम लोग कभी अपने देश में मैत्रीय सम्बध स्थापित कर पाए। सर्वश्रेष्ठ बनने की प्रतिस्पर्धा में कहीं हम हमारे देश को फिर से गुलाम बनाने की कवायद तो नहीं कर रहे।
           सोचो ग़र सारी राजनीतिक पार्टीयाँ मन से एक होकर प्रेम और सोहर्द से रहकर इस देश को सर्वश्रेष्ठ बनाने का प्रयास करे तो क्या हमारे देश में कोई भी ऐसा मुद्दा बचेगा जो हमारे देश को खोखला करें।

जब तुम

तुम ना होओगे

जब मैं

मैं ना हाऊँगां

तब तुम

मुझमें
होओगे

और मैं

तुझमें हाऊँगां

टूटेंगी फिर

सब दीवारें

जो मुझको

तुझसे बांट रही

मिट जाऐंगें

सब फ़ासले

जो तेरे मेरे

दरमयाँ रही

आओ मिलकर

हम देश बुने

आओ मिलकर

हम साथ चलें।

Wednesday, 9 October 2013

दर्द से आहत लल्लू

    इस दुनिया में लल्लूू अकेला तो नहीं हैं दर्द का मारा, जो इस असहनीय दर्द से गुजर रहा हो, ना जाने कितने होगें उसके जैसेे, अनगिनत लोग, जिनकी गिनती हमारी कल्पना से भी परे हैं। जो इसी तरह अपने आपको हर पल मरते हुए ना देखना चाह करके एक ही बार में अपनी इहलीला समाप्त कर देना चाहते हो। लेकिन वे शायद ये सोचकर खामोश हो जाते हैं कि “ये जीवन हैं हर परिस्थिति में इसे जीना ही होगा।” लेकिन ना जाने क्यों लल्लूू को देखकर मेरे मन में ये विचार आ रहे हैं कि काश ऐ “मन” तू समन्दर होता और लल्लूू का सारा गम अपने में समा लेता।
“लल्लूू” एक ऐसा व्यक्ति है जो ईश्वर पर अटूट विश्वास रखते हुए सात्विक जीवन यापन करना चाहता हैं, पर इंसान जैसा सोचे अगर वैसा हो जाये तो फिर क्या अन्तर रह जायेगा भगवान में और इंसान में। वो जन्म से ही अनेक प्रकार के असाध्य रोगों से पीडि़त है। उसके घर वालों को दोे जून की रोटी के भी लाले पड़ रहे हैं, ऐसे में कहाँ से लाये वो लल्लूू के इलाज का पैसा। फिर भी उसके घर वाले अपने पेट पर पट्टियाँ बांधते हुए लल्लू के जन्म से ही उसका इलाज करवा रहे हैं, लेकिन लल्लूू का स्वास्थ्य कभी एक सप्ताह ठीक रहता तो आने वाले महीनों तक उसकी हिम्मत बिस्तर से उठ पाने की भी ना होती, लल्लूू की उम्र अब पैंतीस वर्ष की हैं अब उसे उसके पिता की लाठी बनना चाहिए था लेकिन अब भी उसके पिता ही उसे रोजमर्रा के कार्यों से निवृत करवा रहे हैं और लल्लूू के पिता उम्र के आखिरी पड़ाव पर भी बेलदारी का काम कर अपने परिवार का भरण पोषण कर रहे हैं क्यों कि लल्लूू के छोटे भाई का भी कुछ समय पहले एक सड़क दुर्घटना में एक पैर टूट चुका हैं, और वो भी बिस्तर पर पड़ा हैं, दूसरा भाई हैं जो परिवार की जिम्मेदारियों से मुँह मोड़ते हुए घर से पृथक हो गया हैं। लल्लूू की भाभी भी उसे खरी खोटी सुनाने में कोई कसर ना छोड़ती हैं। लल्लूू बेचारा झेंपते हुए सब कुछ सुनता रहता हैं लेकिन लल्लूू की भाभी के सामने उसके बड़े भाई साहब की एक ना चलती, अब लल्लूू की माँ धुंधलाती आँखों से घर का सारा काम करती हैं, घुटनों के दर्द के मारे उठने बैठने में भी वो हमेशा खुद को तकलीफ में पाती हैं, माँ और पिता अपनी वृद्धावस्था को ध्यान में रखते हुए लल्लूू पर शादी करने का भी दबाव बनाते हैं लेकिन घर वालों के इस प्रस्ताव को लल्लूू ठुकरा देता हैं और लल्लूू घर वालों को जवाब देता हैं कि मैं अपना बोझ उठाने में सक्षम नहीं हूँ तो शादी के बाद क्या मुझे किसी ओर की जिंदगी के साथ खिलवाड़ करने का अधिकार हैं? लल्लूू के पिता उस पर झल्लाते हुए बोलते हैं तुम्हें शादी करनी होगी, जवाब में लल्लूू झुंझलाते हुए कहता हैं “नहीं कतई नहीं, मैं ऐसा नहीं कर सकता” इस पर लल्लूू के पिता को उस पर गुस्सा आ जाता हैं और उसे कहते हैं “ चलो आज तक तुमने मुझे एक रूपया भी कमाकर नहीं दिया लेकिन तुम मेरा ये कहा भी नहीं मान रहे हो, आखिर कब तक मैं तुम्हारा बोझा ढ़ोता रहूँ।” इसी प्रकार के विवाद और क्लेश की स्थिति अब घर में निरंतर बनी रहती हैं।
रोज-रोज के क्लेश और तानाकशी से तंग आकर के एक दिन लल्लूू घर छोड़ कर किसी अन्जान शहर चला गया। जहाँ मीलों दूर तक लल्लूू को कोई नहीं जानता। महज़ घर से चले जाने से लल्लू के दुखों का अन्त हो गया होता तोे काॅफी होता लेकिन अब लल्लूू के सामने कई प्रकार के संकट उत्पन्न हो गए, दो जून की रोटी का जुगाड़, रहने के लिए भीड़ भरे शहर में ठिकाने की तलाश और अपनी बीमारी का इलाज करवाने के लिए पैसा कमाने की ज़द्दोजहद। वो काम की तलाश में दर बदर भटकता, पर कोई भी उसके कमजोर शरीर को देखकर उसे काम ना देता। दिन ब दिन लल्लूू का स्वास्थ्य और भी खराब होने लगा पर उसकी ऐसी दशा देखकर के कई लोग सहानूभूति दिखाते पर मदद को दूर तलक कोई भी नजर ना आता। इसलिए वो अपने जीवन को किश्तों में जी रहा हैं। एक दिन काम की तलाश में घूमते हुए लल्लूू किसी ठेकेदार से मिला, ठेकेदार ने उसे बेलदारी का काम दे दिया, लल्लूू ने चिलचिलाती धूप में गिरते सम्भलते हुए कुछ समय काम किया, काम करते हुए एकाएक  लल्लूू के सिर पर से पत्थरों की भरी तगारी लल्लूू के ऊपर गिर गई। लेकिन जैसा कि हमें विदित हैं मनुष्य प्रजाति को नुकसान शब्द से इतनी ईष्या हैं तो नुकसान हो जाना कहाँ बर्दाश्त हो सकता हैं, लल्लूू की मनोदशा को वहाँ भला कौन समझ पाता, क्योंकि जिंदा लाशें जो बसती हैं इस धरती पर। लल्लूू को चंद पैसे देकर ठेकेदार ने चलता किया। लल्लूू के जीवन में हमेशा भोर होने से पहले ही सांझ हो जाया करती हैं।
अगले ही दिन लल्लूू को तेज बुखार के साथ खांसी, जुकाम, उल्टी और दस्त भी होने लगी और वो दर्द से कराहने लगा। दूर तलक कोई नहीं हैं अपने कांधें का सहारा देकर उसे अस्पताल तक ले जाने वाला। इसलिए वो खुद ही लड़खड़ाते हुए अस्पताल में डॅाक्टर को दिखाने के लिए पहुँचा। अस्पताल में पहुँचते ही लल्लूू अचेत हो गया, आनन फानन में डॅाक्टर ने उसे अस्पताल में भर्ती कर लिया, और ग्लूकोज़ की बोंतलें चढ़ानी शुरू कर दी। कुछ देर बाद जब लल्लूू को होश आया तो अपनी इस अवस्था पर फूट फूट कर रोने लगा, मगर वहाँ उसके पास उसका रूग्ण पोंछने वाला कोई नहीं। लावारिस की भांति दो दिन तक लल्लूू अस्पताल में ही भर्ती रहा। जब उसे अस्पताल से छुट्टी दी गई तो रास्ते में भरी दोपहर होने के कारण वो थोड़ी देर एक सूखे पेड़ की मद्दम छाँव में बैठ गया, और आँसू बहाते हुए अपने आप को कोसने लगा। और सोचने लगा उन जख््मों का मरहम कहाँ े इस दुनिया से मिले हैं। अब लल्लूू का धैर्य भी जवाब दे चुका हैं और उसे लग रहा था कि उसके जीवन में सिर्फ अंधेरा ही अंधेरा रह गया हैं एक ऐसा अंधेरा जिसे मिटाने वाला रोशन सवेरा शायद कभी ना हो। जिस प्रकार सूरज और चद्रंमा को ग्रहण लगता हैं ठीक उसी प्रकार से उसके जीवन को भी ग्रहण लग गया हैं।
क्या महज् साँसों का चलना जीवन हैं, क्या रोगर्युक्त असहनीय दर्द को सहन करना जीवन हैं। क्या मुफलिसी में बिताया गया जीवन ‘‘जीवन‘‘ हैं। ये सवाल उसके खुद से थे और जवाब देने वाला कोई नहीं।
©Copyright                                                                          
                                   
                         मनीष शर्मा
              लेखक बाड़मेर (राजस्थान)



Sunday, 15 September 2013

स्वामी नरेन्द्र विवेकानन्द



हिन्दी दिवस के पखवाड़े का आज दूसरा दिन हैं जिसमें संस्कार भारती, बाड़मेर की ओर से आयोजित स्वामी विवेकानन्द सार्द्ध शति पर काव्य संगोष्ठी का आयोजन आज गांधी चौक विधालय, बाड़मेर के प्रागंण में किया गया, जिसमें  शहर के कई जाने माने कवियों और साहित्यकारों ने शिरकत की। स्वामी विवेकानन्द जी के व्यक्तित्व पर मेरे द्वारा लिखी कविता जिसका शीर्षक “स्वामी नरेन्द्र विवेकानन्द” को आज प्रस्तुत करने का अनुभव मेरे लिए अविस्मरणीय रहा। स्वामी जी को शब्दों में बयान कर पाना बेहद मुश्किल है, लेकिन मेरे लिए प्रसन्नता की बात ये रही कि प्रसिद्ध कवियों और साहित्यकारों की शोहबत में रहकर मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला और मेरे द्वारा कही कविता की कवियों और साहित्यकारों ने सराहना की। इस सराहना ने मेरे भीतर एक नई ऊर्जा का संचार सा कर दिया हैं और वरिष्ठ कवियों और साहित्यकारों द्वारा मिले इस प्यार के कारण मुझमें अच्छा कार्य करने का जज्बा भी जाग उठा। गुजरे दिन से मेरी शिथिलता आज कुछ कम थी, लेकिन मैं अपने आप को पूरी तरह से सहज महसूस नहीं कर पा रहा था लेकिन सहज होने का बार बार प्रयास ज़रूर कर रहा था। खैर इसी के साथ एक अच्छी काव्य संगोष्ठी का समापन हुआ पुरस्कार वितरण के साथ।

स्वामी नरेन्द्र विवेकानन्द


 जिनके मुख पर सदा ही रहता

वीर पुरूष सा तेज अलौकिक
 

जिनकी काया में बल रहता
 

इन्द्रदेव के वज्र के माफि़क

शांत चित्त और निर्मल वो थे
 

वाणी से रस माधुर्य था टपका
 
भाषण देते थे वो ऐसे
 

जैसे कोई शेर हो गरजा 

मन से थे वे दृढ़ संकल्पी
 

आत्मा से भाव विभोर
 

नैनों में थी चमक निराली
 

पुरूषार्थ से थे सराबोर
 

पूजा पाठ और ध्यान योग में
 

भक्ति उनकी पूरी थी
 

काम क्रोध और मोह माया से
 

मीलों उनकी दूरी थी
 

कर्मयोग का भेद सिखाकर
 

जग को दिया नया आधार
 

हिन्द प्रांत की गाथा गाकर
 

पश्चिम को दिये नये विचार
 

हिन्दी क्या है हिन्दू क्या है
 

अर्थ बताया ऐसे साधक
 

हिन्दी क्या है हिन्दू क्या है

थे भारतीय संस्कृति के प्रचारक

जग जाने हैं स्वामी उनको
 

माँ के थे वो नरेन्द्रनाथ
 

छवि थी उनकी बड़ी ही अद्भुत

सादा जीवन उच्च विचार

उनके पदचिन्हों पर चलना  
 

चाहे भारत माँ का लाल
 

यी दिशा दी है  "मन" को
 

हो साकार भारत माँ का ख्वाब
 
आत्मसात कर लिया हैं जिको
 

नाम जपे हर कंठ
 

आदर्श हैं और वो ही रहेंगें
 

स्वामी विवेकानन्द !!


Saturday, 14 September 2013

शिथिल मन



आज हिन्दी दिवस के अवसर पर हमारे शहर बाड़मेर में एक काव्य संगोष्ठी का आयोजन हुआ, जिसमें मुझे भी शामिल होने का अवसर प्राप्त हुआ, बहुत ही मंझे हुए कवि और साहित्यकार थे इस संगोष्ठी में। एक श्रोता बनकर तो मैंने कवियों से कविताऐं कई बार सुनी पर एक कवि का कविता कहने का अहसास क्या होता है वो मैंने आज पहली बार महसूस किया।

कविता पठन से पहले की शिथिलता और मन में उत्पात एक विचित्र सी स्थिति होती है हालाँ कि मैं इससे पहले कई बार किसी ना किसी प्रकार के विषयों पर अभिव्यक्ति देने के लिए मंच पर जा चुका था लेकिन ये सत्य हैं कि हर एक जगह का अपना एक अलग ही दबाव होता हैं और यहाँ में खुद को कुछ ऐसे ही दबाव के तले दबा महसूस कर रहा था।

सभी लोगो का ध्यान भी मुझ पर केन्द्रित हो गया था और मेरी दशा बिल्कुल वैसी थी जैसा कि एक नए प्रेमी की होती हैं जो अपनी प्रेमिका को प्रेम का इज़हार करने से पहले अपने मन को ना जाने कितनी बार समझाता होगा पर “मन” मन भला कहाँ समझ पाता है, संगोष्ठी के आरम्भ से लेकर अन्त तक कविताओं के रस से माहौल सराबोर रहा।


एक अच्छे अनुभव के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ जिसमें सभी कवियों को पुरस्कृत कर सम्मानित किया गया। शुक्रिया अदा करता हूँ मैं उस रब का और उन लोगों का जिन्होनें मुझे मंजि़ल की और अग्रसर होने का फलसफ़ा सिखाया।