कद इथ डोले, कद उथ भागे, बावरा मनवा मोरा, मोरी इक ना माने मन, मन के आगे, अब मैं हारा !!!
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Monday, 10 September 2018
“मैं”
Tuesday, 3 July 2018
फ़िल्म संजू की समीक्षा मेरी कलम से।
Sunday, 8 April 2018
सौ सालों के बाद हमारे देश भारत में सब कुछ सही हो जायेगा।
सौ सालों के बाद हमारे देश भारत में सब कुछ सही हो जायेगा। कुछ भी अस्त व्यस्त नहीं होगा। आर्थिक, धार्मिक और नैतिक कोई द्वंद नहीं होगा। कोई बेरोजग़ार नहीं होगा। किसी को आरक्षण की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी। कहीं कोई लाईन नहीं होगी। सभी के पास तरक्क़ी के पर्याप्त अवसर होंगे। हर व्यक्ति साठ वर्ष की आयु में भी तीस वर्ष सा नज़र आयेगा। कोई गला काट आगे बढ़ने जैसी प्रतिस्पर्धा नहीं होगी कोई चोरी चकारी, लूटपाट नहीं होगी। सभी को ज़रूरत की वस्तुऐं उपलब्ध होंगी। एक वस्तु की ख़्वाहिश में चार वस्तुऐं हाज़िर होंगी। भूलवश कोई अपराध हो भी गया तो कानून व्यवस्था ऐसी कि हाथों हाथ न्याय और दोषी को कठोर दंड।
शिक्षा इतनी बेहतरीन होगी कि अच्छी पढ़ाई लिखाई करके बच्चे अपनी पसंद के व्यवसाय का चुनाव कर पायेंगे और देश के एक ज़िम्मेदार नागरिक बन पायेंगे।
स्वास्थ्य सेवायें ऐसी कि अस्पताल में एक डॉक्टर गिनती के मरीज़ देखेगा। एक नर्स या कंपाउंडर सिर्फ़ एक ही मरीज़ के लिए होगा। दवाइयाँ और खून जाँच की गुणवत्ता ऐसी कि एक बार के ट्रीटमेंट से ही मरीज़ ठीक हो जायेगा।
परिवहन सेवायें ऐसी होंगी कि हर व्यक्ति सिर्फ़ अपनी सीट पर बैठेगा। वर्तमान की तरह ऐसा नहीं कि चार लोगों की सीट पर सात लोग बैठें हो या दर्जनों लोग सीट मिलने के इंतजार में खड़े हों। कोई सीट के लिए झगड़ेगा नहीं। ना ही ऐसी स्थिति होगी कि किसी को फलाँ स्टेशन पर उतरना हो लेकिन भीड़ का दबाव उसे उसके गन्तव्य स्थान से पहले ही उतार दे।
महिलायें पूरी तरह से महफ़ूज़ होंगी। बलात्कार पर पूर्णतया अंकुश लग जायेगा। अग़र कहीं कोई वारदात हो भी जाती है तो तुरंत प्रभाव से पुलिस पहुंच जायेगी। अपराधी को ऐसी सज़ा दी जायेगी कि भविष्य में अपराध का ख़्याल भी किसी अपराधी के जेहन से धूमिल हो जायेगा।
रास्तों में कभी कोई भीख मांगता हुआ नज़र नहीं आयेगा। ना ही कभी कोई झुग्गी झोंपड़ी नज़र आयेगी। कहीं कोई शोषित नहीं होगा।
वर्तमान में 2 जी से 4 जी तक के सफ़र में बरसों लगे। जिसमें भी देश की बहुत बड़ी आबादी सीधी 2 जी से 4 जी में पहुँची है। वो आबादी 3 जी स्पीड से मेहरूम रही। लेकिन सौ साल बाद संचार व्यवस्था हमेशा दुरुस्त और बेहतरीन होगी।
जिस बैलेंस डायट की बातें अक़्सर हमने किताबों में पढ़ी है। वो बैलेंस डायट लोगों की थाली में होगी। फिर 1 सब्जी और कुछ चपातियों से पेट नहीं भरना होगा।
ईमानदार लोगों के लिए ये धरती जन्नत बन जायेगी और बेईमानों के लिए दोज़ख़।
देश को वीटो पावर भी मिल जायेगा। देश विकाशशील ना रहकर के विकसित देशों में शामिल हो जायेगा। विकास की एक ऐसी गंगा बहेगी जिसमें ख़ुशहाली ही ख़ुशहाली नज़र आयेगी।
सौ सालों के बाद हमारे देश भारत में सब कुछ सही हो जायेगा "अग़र जनसंख्यावृद्धि पर एक बेहतरीन सरकार लग़ाम लगा लेती हैं तो..."
~ मनीष शर्मा
Saturday, 31 December 2016
नववर्ष नयी सी आभायें बिखेरने आया हैं।
Happy New Year
नववर्ष नयी सी आभायें बिखेरने आया हैं
जीवन में उमंग, तरंग, आनंद भरने आया हैं
नवचेतना का नव संचार करने आया हैं
जीवन मूल्यों को नव आधार देने आया हैं
जीवन के सुनहरे से केनवास पर
ख़ुशहाली की नव तस्वीर बनाने आया हैं
गत वर्ष जिन रंगों से अछूता रहा जीवन
मुट्ठी में भर उन रंगों को उछालने आया हैं।
#ManishSharma
Saturday, 12 November 2016
ताउम्र पैसों के इर्द गिर्द घूमती रही कमबख़्त ज़िंदगी...
ताउम्र पैसों के इर्द गिर्द
घूमती रही कमबख़्त ज़िंदगी
रिश्तों की परछाईयाँ
अंधेरों में ढूँढती रही ज़िंदगी
पैसा हाथ से फ़िसला
रिश्ते लकीरों से गिरे
फ़िर भी गुरेज़ से ऊँचा
मस्तक किये भागती रही ज़िंदगी
बचपन में खेल खिलौनों से
जी भर मन बहलाया
युवावस्था से मरणासन्न तक
पैसों से ख़ूब खेलती रही ज़िंदगी
पलकें ख़्वाहिशों का बोझ ढोये
सफ़र तय करती रही मीलों का
बहरूपिये पैसे संग
आँख मिचौली करती रही ज़िंदगी
ताउम्र पैसों के इर्द गिर्द
घूमती रही कमबख़्त ज़िंदगी
रिश्तों की परछाईयाँ
अंधेरों में ढूँढती रही ज़िंदगी !!!
#ManishSharma
Friday, 30 September 2016
सलाम भारतीय सेना
मुझे बड़ी हैरानगी होती हैं जब अपनी रोटियाँ सेंकने के लिये कोई मुल्क़, किसी मुल्क़ में बेपनाह आतंकवाद को पनपने देता हैं। मैं बात कर रहा चीन की जो जानता हैं कि पाकिस्तान आतंकवाद को पालते हुए पूरे विश्व में आतंकवाद फैला रहा हैं और भारत इससे सबसे ज्यादा प्रभावित हैं फिर भी चीन अपने हथियार और रसद सामग्री पाकिस्तान को बेचने के चलते अपना स्वार्थ साध रहा हैं। मैं अभी कुछ देर पहले टीवी में देख रहा था जिसमें पाकिस्तान के किसी टीवी चैनल पर भारत द्वारा किये गए सर्जीकल स्ट्राइक पर चर्चा चल रही थी। टीवी चैनल के संवाददाता खुले में कह रहे थे कि भारत अगर दाऊद इब्राहिम को मारना चाहता है तो दाऊद पकिस्तान में नहीं हैं और रही बात "हाफ़िज़ सईद" की तो उनके फियादीन इतनी तादाद में हैं कि भारत की ओर से आने वाले किसी भी इंसान चाहे वो सैनिक हो या कोई भी शख़्स उसकी टाँगे तोड़ दी जायेगी, उसकी जान को भी ख़तरा होगा। अब मुझे समझ में ये नहीं आ रहा कि पाकिस्तान के समर्थन में वहाँ की जनता हैं भी या नहीं क्यों की वहाँ की बहुत बड़ी आबादी आज भी मूलभूत आवश्यकताओं से जूझ रही हैं। पेट में रोटी नहीं बात ज़ेहाद की, ये बात बड़ी बेमानी सी लगती हैं। पाकिस्तान के हुक्मरान उनकी जनता की मूलभूत आवश्यकताओं तक तो पहुँच नहीं पा रहे हैं और बात कर रहे भारत से कश्मीर को लेने की। अब कोई पाकिस्तान से ये पूछे की जो तुम्हारे पास हैं वो तुमसे संभाला नहीं जा रहा। तो कश्मीर लेने की ख़्वाहिश रखते हुए इसे भी भूखा नंगा बनाना चाहते हो। पाकिस्तान को ख़ुद की ज़मीन को चमन बनाने या ज़न्नत बना लेने पर मंथन करना चाहिये। पाकिस्तान की आवाम ने अग़र उनके ही मुल्क़ में बग़ावत का बिगुल एक स्वर में बजा दिया तो पाकिस्तान में गृह्क्रान्ति हो जायेगी और फ़िर कभी भी किसी भी मुल्क़ में आतंकवाद फैलाना तो दूर की बात पाकिस्तान आतंकवाद के बारे में सोच भी नहीं पायेगा। जय हिंद।
Monday, 15 August 2016
आज़ादी की एक भोर ऐसी भी होगी...
शरीर तो आज़ाद हो गये थे 1947 में
सोच आज भी इंतज़ार में हैं रिहाई के
विकार के सारे बादल छंट जायेंगे इक दिन
हर एक कोने में धूप छम से बिखर जायेगी
सारे भेद मिटा उस दिन हम इंसान बन जायेंगे
उस दिन सभी की थाली में रोटी होगी
किसी की भी आँखें नम ना होगी
जमीं पर प्रेम और वात्सल्य की बरखा होगी
आज़ादी की एक भोर ऐसी भी होगी
जाति, धर्म और मज़हब की आड़ में
ना किसी की कुटिया जलेगी
ना किसी की चिता सुलगेगी
ना कोई बेबस होके सूत भरेगा
ना ही कोई जीते जी रोज़ मरेगा
बहन बेटियाँ और बहुओं की
अस्मत तार तार ना होगी
सारा देश उनके घर सा होगा
और वो ख़ुद को महफूज़ समझेगी
आज़ादी की एक भोर ऐसी भी होगी
उस दिन जश्न ए आज़ादी सही मायनों में होगी !!!
#ManishSharma
Happy Independence Day
Sunday, 12 October 2014
जन्नत सिसक रहा है !!!
बाढ़ग्रस्त हैं गलियां सारी
विकट परिस्थितियाँ हुई हैं भारी
चीत्कार रहे हैं सारे कूचे
नम निगाहें इधर उधर
बस अपनों को ही ढूंढें
ग़म भारी है और दर्द हावी
हर ओर फैली भयावह त्रासदी
डल तबाह हो चुकी है
शिकरे सभी हुए तहस नहस
कोई तो देखो, कोई तो थामों
नम निगाहें मदद मांगे
उदास चेहरे भीतर झांके
कश्मीर (जन्नत) सिसक रहा है
अपने ज़ख्मों पर फफक रहा है
कश्मीर (जन्नत) सिसक रहा है
अपने ज़ख्मों पर फफक रहा है !!!
Poet : Manish Sharma
Sunday, 3 August 2014
दोस्त हो कोई...
यहाँ दोस्त तो
सभी है हमारे
दिल के क़रीब भी
होता कोई
लभों से कुछ ना
कहते उसे
नैनों की भाषा
समझता कोई
कुछ अपनी कहते
कुछ उसकी सुनते
बातें बेवजह यूँ ही
होती कोई
ख़ुशी में हँसते
ग़म में ग़मगीन होते
ऐसा कभी कहीं
अपना भी होता कोई
राज जो सीने में
दबे है हज़ारों
इन्हें जान पाता ऐसा
राजदार होता कोई
अब तक नहीं मिला
सच्चा दोस्त कोई
एक दिन जरूर मिलेगा
सच्चा प्यारा दोस्त कोई
Happy Friendship Day !!
Manish Sharma
Sunday, 24 November 2013
उठो और देश बुनो...
जब तुम
तुम ना होओगे
जब मैं
मैं ना हाऊँगां
तब तुम
मुझमें होओगे
और मैं
तुझमें हाऊँगां
टूटेंगी फिर
सब दीवारें
जो मुझको
मिट जाऐंगें
सब फ़ासले
जो तेरे मेरे
दरमयाँ रही
आओ मिलकर
हम देश बुने
आओ मिलकर
हम साथ चलें।
Wednesday, 9 October 2013
दर्द से आहत लल्लू
Sunday, 15 September 2013
स्वामी नरेन्द्र विवेकानन्द
जिनके मुख पर सदा ही रहता
वीर पुरूष सा तेज अलौकिक
जिनकी काया में बल रहता
इन्द्रदेव के वज्र के माफि़क
शांत चित्त और निर्मल वो थे
वाणी से रस माधुर्य था टपका
भाषण देते थे वो ऐसे
जैसे कोई शेर हो गरजा
मन से थे वे दृढ़ संकल्पी
आत्मा से भाव विभोर
नैनों में थी चमक निराली
पुरूषार्थ से थे सराबोर
पूजा पाठ और ध्यान योग में
भक्ति उनकी पूरी थी
काम क्रोध और मोह माया से
मीलों उनकी दूरी थी
कर्मयोग का भेद सिखाकर
जग को दिया नया आधार
हिन्द प्रांत की गाथा गाकर
पश्चिम को दिये नये विचार
हिन्दी क्या है हिन्दू क्या है
अर्थ बताया ऐसे साधक
हिन्दी क्या है हिन्दू क्या है
थे भारतीय संस्कृति के प्रचारक
जग जाने हैं स्वामी उनको
माँ के थे वो नरेन्द्रनाथ
छवि थी उनकी बड़ी ही अद्भुत
सादा जीवन उच्च विचार
उनके पदचिन्हों पर चलना
चाहे भारत माँ का लाल
नयी दिशा दी है "मन" को
हो साकार भारत माँ का ख्वाब
आत्मसात कर लिया हैं जिनको
नाम जपे हर कंठ
आदर्श हैं और वो ही रहेंगें
स्वामी विवेकानन्द !!
Saturday, 14 September 2013
शिथिल मन
कविता पठन से पहले की शिथिलता और मन में उत्पात एक विचित्र सी स्थिति होती है हालाँ कि मैं इससे पहले कई बार किसी ना किसी प्रकार के विषयों पर अभिव्यक्ति देने के लिए मंच पर जा चुका था लेकिन ये सत्य हैं कि हर एक जगह का अपना एक अलग ही दबाव होता हैं और यहाँ में खुद को कुछ ऐसे ही दबाव के तले दबा महसूस कर रहा था।
सभी लोगो का ध्यान भी मुझ पर केन्द्रित हो गया था और मेरी दशा बिल्कुल वैसी थी जैसा कि एक नए प्रेमी की होती हैं जो अपनी प्रेमिका को प्रेम का इज़हार करने से पहले अपने मन को ना जाने कितनी बार समझाता होगा पर “मन” मन भला कहाँ समझ पाता है, संगोष्ठी के आरम्भ से लेकर अन्त तक कविताओं के रस से माहौल सराबोर रहा।
Sunday, 17 March 2013
मेरी जिंदगी मेरे नियम
मैं मेरी जिंदगी मेरे मुताबिख जीना चाहता हूँ, और ये भी ख्याल रखना चाहता हूँ कि मेरी वजह से किसी कि भावनाऐं आहत ना हो, पर शायद ये मुमकिन नहीं क्यों कि आग और पानी भला एक दूसरे के मित्र कैसे बन सकते हैं, मुझ पर पाश्चात्य संस्कृति की गहरी छाप हैं पर शायद ये मेरी संस्कृति वाले लोगों को बरदाश्त नहीं, इन्हें शायद पाश्चात्य संस्कृति में अश्लीलता नज़र आती हैं पर मेरी नज़र में अश्लीलता देखने वाले की नज़रो में होती हैं ना कि संस्कृति में। पाश्चात्य संस्कृति वाले लोग कम से कम जैसे हैं वैसे दिखाई तो देते हैं हम लोग दोहरी जिंदगी जीते हैं, मन में तो अश्लीलता भरे हुए हैं और चेहरे पर सात्विक नकाब लगाऐ घूम रहे हैं, मैं जानता हूँ मेरे इन लव्जों की वज़ह से मेरी छवि उन लोगों में बहुत खराब हो जाएगी जो मेरी बात से सरोकार नहीं रखते पर जैसा कि मैंने कहा ‘‘मैं मेरी जिंदगी मेरे मुताबिख जीना चाहता हूँ‘‘ तो क्यों ना मैं जीने का प्रयास बड़ी शिद्दत से करूँ.........Saturday, 2 March 2013
"तानाशाह सम़ाज़, बेबस इंसान"
Monday, 25 February 2013
मैं कायर हूँ
मैं वो बनने का प्रयास कर रहा हूँ
जो मैं नहीं हूँ
झूठी मुस्कान लिए
नकली नकाब़ पहने
मैं उन लोगों की हाँ में हाँ भर रहा हूँ
जो इस काबिल नहीं
मैं उन लोगों की जी हूज़ूरी कर रहा हूँ
जो इस लायक नहीं
मुझे ये करना होगा
क्यों कि मेरे पास
इसके सिवा कोई चारा नहीं
क्यों कि मुझमें बगावत
करने की ताकत नहीं....
Sunday, 24 February 2013
बेबस निग़ाहें
Tuesday, 12 February 2013
मैं तुम नहीं
मैं वो नहीं होना चाहती, जो तुम हो
मैं तुम हो गयी तो मैं, मैं नहीं रहूंगी
मैं थम गयी, तो फिर कभी नहीं बहूँगी
मेरा वजूद तुम नहीं हो
मेरी पहचान तुम नहीं हो
मेरे जीने की वज़ह तुम नहीं हो
मेरे हँसने का सबब तुम नहीं हो
मेरे अल्फाज़ तुम नहीं हो
मेरी परवाज़ भी तुम नहीं हो
तुमने मुझे क्या समझा
भोग विलास का साधन
तुमसे मुझे क्या हासिल
ग़म, दर्द, यातना
मैं सदियों से सहती आ रही हूँ
क्या अब भी सहूँ
मैं बरसों से खमोश रही हूँ
क्या अब भी चुप रहूँ....?
Monday, 7 January 2013
‘‘हार गई ज़िदगीं‘‘
दोस्तों !
दिल्ली में 16 दिसम्बर 2012 को घटित 23 वर्षीय छात्रा के साथ हुई बलात्कार की घटना को मैने अपने शब्दों को एक कविता के रूप में व्यक्त करने का प्रयास किया हैं उम्मीद रखता हूँ कि आप लोग इसे कविता ना समझकर के एक ऐसा आहृवान समझेगें जिसमें हम सभी मिलकर के यह प्रण करें कि समाज में फ़िर से कभी भी बलात्कार जैसा घिनौना कृत्य दोबारा ना हो पाये।
तो किस शहर में घर बसाऊँ














