कद इथ डोले, कद उथ भागे, बावरा मनवा मोरा, मोरी इक ना माने मन, मन के आगे, अब मैं हारा !!!
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Sunday, 16 August 2020
दिल की आख़िरी मंज़िल प्यार और पैसा हो।
Monday, 15 June 2020
सुशांत सिंह राजपूत हमेशा याद रहेंगे।
आत्महत्या करना ग़लत है, बहुत ग़लत। किसी के आत्महत्या किये जाने के बाद हम ये बात कितनी सरलता से कह देते हैं। ऐसा नहीं हैं कि मेरे इस आलेख में, मैं आत्महत्या करने वालों का समर्थन कर रहा हूँ। मैं आत्महत्या जैसे कृत्य की निंदा करता हूँ। लेकिन हमें आत्मीयता रखते हुए हर व्यक्ति के साथ शालीनता और अपनत्व का व्यवहार करना चाहिए। जिससे आत्महत्यायें सरीक़ी घटनाओं पर अंकुश लग सके।
आज तक ना जाने कितने लोगों ने आत्महत्यायें की होगी। लेकिन ना हमने कभी आत्महत्या करने वाले की मनोस्थिति जानने का प्रयास किया। ना ही आत्महत्या करने के पीछे के कारणों को जानने की ज़हमत उठायी। यहाँ तक कि भविष्य में कभी कोई आत्महत्या ना करे इस तरह के एहतियातन क़दम भी नहीं उठाये। उठाते भी तो कैसे हम परिणामों के बाद जागते हैं। परिणाम से पहले हमें सब कुछ सामान्य नज़र आता है। क्या आत्महत्या एक ही पल में लिए जाने वाला फ़ैसला है ? शायद नहीं ! बहुत टूटकर बिखरता होगा वो इंसान, जो आत्महत्या करता है। हर तरफ़ अंधेरा ही अंधेरा। रोशनी की कोई किरण कहीं से भी नज़र नहीं आती दिखाई पड़ती होगी।
आत्महत्या करने के तरीक़े अलग अलग हो सकते हैं। लेकिन कारण एक ही है मानसिक तनाव। ऐसा तनाव जिसमें व्यक्ति को लगता है कि अब इस दुनिया में उसकी बात सुनने, समझने वाला कोई नहीं बचा। वैसे भी इस भागदौड़ भरी दुनिया में किसे फ़ुरसत है किसी की बात सुनने की। हर कोई एक ऐसी दौड़ में दौड़ रहा है जिसकी मंज़िल कहाँ है, कोई नहीं जानता।
ज़्यादातर मामलों में व्यक्ति की आर्थिक स्थिति का कमज़ोर होना भी आत्महत्या का कारण बनती हैं। आत्महत्या को बढ़ावा देने में दकियानूसी समाज भी ज़िम्मेदार हैं। समाज की रिवायतें, हमेशा इंसान की सरलता पर हावी रही हैं। क़दम- क़दम पर बेड़ियाँ बाँधता है समाज। अगर कोई इन बंधनों को तोड़ने के प्रयास करता है तो उसे हज़ारों तोहमतें लगाकर ज़लील किया जाता हैं।
हमारे जीने के सारे अधिकार, हमारे पास नहीं, समाज के पास सुरक्षित हैं।
यहाँ मुझे, मेरा लिखा एक शेर याद आ रहा है। "जीवन सरलता का मज़मा है, इसे जटिलता से मत जियो।"
वैसे आज के दौर में किस पर यक़ीन किया जाये, किस पर नहीं। ये भी एक बहुत बड़ी समस्या हैं। क्योंकि जो हमराज़ होते है, वे ही किसी अलगाव के बाद हमारे सारे राज़ से पर्दाफ़ाश करते हैं।
सुशांत सिंह राजपूत द्वारा की गई आत्महत्या इस बात को और पुख़्ता करती है कि बाहर से खुशमिज़ाज इंसान, भीतर से कितना मायूस, दुःखी हो सकता है। इस घटना के बाद प्रतीत होता है कि ग्लैमर की दुनिया कितनी खोखली है, जिसे देखकर लगता है कि सभी झूठी मुस्कानें लिए जी रहे हैं। ग्लैमर की दुनिया वाले ज़्यादातर लोग दोहरा चरित्र जीते हैं और दोहरा चरित्र एक नया एक दिन व्यक्ति को अवसादग्रस्त बना देता है।
उम्मीद करता हूँ कि इस तरह की घटनाओं पर अंकुश लगे। सभी का व्यवहार, सभी के प्रति सरल और सहज हो क्योंकि हम कौन से सदियाँ जीने आये हैं। जो एक दूजे से जलते हैं। हाड़ माँस के पुतले हैं, एक दिन मिट्टी में मिल जाना तय है, फिर भी जिसे देखो सीने में एक कुफ़्र (आग) लिए घूम रहा है।
एक अच्छे, सरल व्यक्तित्व वाले कलाकार को आज हमने खो दिया। जिसने बहुत कम उम्र में अपनी मेहनत के बूते एक अच्छा मुक़ाम हासिल किया। भगवान आपकी दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान करें। आप हमेशा याद रहेंगे। #SushantSinghRajput
~ मनीष शर्मा
Monday, 11 May 2020
मानव जीवन बनाम अर्थव्यवस्था
कोरोना से लड़ाई बहुत लंबी चलेगी। अब हमें हमारी समझदारी ही बचा सकती है।
Tuesday, 31 March 2020
जीवन संघर्ष।
Sunday, 4 August 2019
दोस्त, मिले तो फिर बिछड़े ना।
Wednesday, 3 July 2019
फ़िल्म क़बीर सिंह की समीक्षा।
Monday, 31 December 2018
Sunday, 30 September 2018
आधुनिक भारत।
Tuesday, 18 September 2018
लेखक तन्हा।
Monday, 10 September 2018
“मैं”
Tuesday, 3 July 2018
फ़िल्म संजू की समीक्षा मेरी कलम से।
Sunday, 8 April 2018
सौ सालों के बाद हमारे देश भारत में सब कुछ सही हो जायेगा।
सौ सालों के बाद हमारे देश भारत में सब कुछ सही हो जायेगा। कुछ भी अस्त व्यस्त नहीं होगा। आर्थिक, धार्मिक और नैतिक कोई द्वंद नहीं होगा। कोई बेरोजग़ार नहीं होगा। किसी को आरक्षण की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी। कहीं कोई लाईन नहीं होगी। सभी के पास तरक्क़ी के पर्याप्त अवसर होंगे। हर व्यक्ति साठ वर्ष की आयु में भी तीस वर्ष सा नज़र आयेगा। कोई गला काट आगे बढ़ने जैसी प्रतिस्पर्धा नहीं होगी कोई चोरी चकारी, लूटपाट नहीं होगी। सभी को ज़रूरत की वस्तुऐं उपलब्ध होंगी। एक वस्तु की ख़्वाहिश में चार वस्तुऐं हाज़िर होंगी। भूलवश कोई अपराध हो भी गया तो कानून व्यवस्था ऐसी कि हाथों हाथ न्याय और दोषी को कठोर दंड।
शिक्षा इतनी बेहतरीन होगी कि अच्छी पढ़ाई लिखाई करके बच्चे अपनी पसंद के व्यवसाय का चुनाव कर पायेंगे और देश के एक ज़िम्मेदार नागरिक बन पायेंगे।
स्वास्थ्य सेवायें ऐसी कि अस्पताल में एक डॉक्टर गिनती के मरीज़ देखेगा। एक नर्स या कंपाउंडर सिर्फ़ एक ही मरीज़ के लिए होगा। दवाइयाँ और खून जाँच की गुणवत्ता ऐसी कि एक बार के ट्रीटमेंट से ही मरीज़ ठीक हो जायेगा।
परिवहन सेवायें ऐसी होंगी कि हर व्यक्ति सिर्फ़ अपनी सीट पर बैठेगा। वर्तमान की तरह ऐसा नहीं कि चार लोगों की सीट पर सात लोग बैठें हो या दर्जनों लोग सीट मिलने के इंतजार में खड़े हों। कोई सीट के लिए झगड़ेगा नहीं। ना ही ऐसी स्थिति होगी कि किसी को फलाँ स्टेशन पर उतरना हो लेकिन भीड़ का दबाव उसे उसके गन्तव्य स्थान से पहले ही उतार दे।
महिलायें पूरी तरह से महफ़ूज़ होंगी। बलात्कार पर पूर्णतया अंकुश लग जायेगा। अग़र कहीं कोई वारदात हो भी जाती है तो तुरंत प्रभाव से पुलिस पहुंच जायेगी। अपराधी को ऐसी सज़ा दी जायेगी कि भविष्य में अपराध का ख़्याल भी किसी अपराधी के जेहन से धूमिल हो जायेगा।
रास्तों में कभी कोई भीख मांगता हुआ नज़र नहीं आयेगा। ना ही कभी कोई झुग्गी झोंपड़ी नज़र आयेगी। कहीं कोई शोषित नहीं होगा।
वर्तमान में 2 जी से 4 जी तक के सफ़र में बरसों लगे। जिसमें भी देश की बहुत बड़ी आबादी सीधी 2 जी से 4 जी में पहुँची है। वो आबादी 3 जी स्पीड से मेहरूम रही। लेकिन सौ साल बाद संचार व्यवस्था हमेशा दुरुस्त और बेहतरीन होगी।
जिस बैलेंस डायट की बातें अक़्सर हमने किताबों में पढ़ी है। वो बैलेंस डायट लोगों की थाली में होगी। फिर 1 सब्जी और कुछ चपातियों से पेट नहीं भरना होगा।
ईमानदार लोगों के लिए ये धरती जन्नत बन जायेगी और बेईमानों के लिए दोज़ख़।
देश को वीटो पावर भी मिल जायेगा। देश विकाशशील ना रहकर के विकसित देशों में शामिल हो जायेगा। विकास की एक ऐसी गंगा बहेगी जिसमें ख़ुशहाली ही ख़ुशहाली नज़र आयेगी।
सौ सालों के बाद हमारे देश भारत में सब कुछ सही हो जायेगा "अग़र जनसंख्यावृद्धि पर एक बेहतरीन सरकार लग़ाम लगा लेती हैं तो..."
~ मनीष शर्मा
Saturday, 31 December 2016
नववर्ष नयी सी आभायें बिखेरने आया हैं।
Happy New Year
नववर्ष नयी सी आभायें बिखेरने आया हैं
जीवन में उमंग, तरंग, आनंद भरने आया हैं
नवचेतना का नव संचार करने आया हैं
जीवन मूल्यों को नव आधार देने आया हैं
जीवन के सुनहरे से केनवास पर
ख़ुशहाली की नव तस्वीर बनाने आया हैं
गत वर्ष जिन रंगों से अछूता रहा जीवन
मुट्ठी में भर उन रंगों को उछालने आया हैं।
#ManishSharma
Saturday, 12 November 2016
ताउम्र पैसों के इर्द गिर्द घूमती रही कमबख़्त ज़िंदगी...
ताउम्र पैसों के इर्द गिर्द
घूमती रही कमबख़्त ज़िंदगी
रिश्तों की परछाईयाँ
अंधेरों में ढूँढती रही ज़िंदगी
पैसा हाथ से फ़िसला
रिश्ते लकीरों से गिरे
फ़िर भी गुरेज़ से ऊँचा
मस्तक किये भागती रही ज़िंदगी
बचपन में खेल खिलौनों से
जी भर मन बहलाया
युवावस्था से मरणासन्न तक
पैसों से ख़ूब खेलती रही ज़िंदगी
पलकें ख़्वाहिशों का बोझ ढोये
सफ़र तय करती रही मीलों का
बहरूपिये पैसे संग
आँख मिचौली करती रही ज़िंदगी
ताउम्र पैसों के इर्द गिर्द
घूमती रही कमबख़्त ज़िंदगी
रिश्तों की परछाईयाँ
अंधेरों में ढूँढती रही ज़िंदगी !!!
#ManishSharma
Friday, 30 September 2016
सलाम भारतीय सेना
मुझे बड़ी हैरानगी होती हैं जब अपनी रोटियाँ सेंकने के लिये कोई मुल्क़, किसी मुल्क़ में बेपनाह आतंकवाद को पनपने देता हैं। मैं बात कर रहा चीन की जो जानता हैं कि पाकिस्तान आतंकवाद को पालते हुए पूरे विश्व में आतंकवाद फैला रहा हैं और भारत इससे सबसे ज्यादा प्रभावित हैं फिर भी चीन अपने हथियार और रसद सामग्री पाकिस्तान को बेचने के चलते अपना स्वार्थ साध रहा हैं। मैं अभी कुछ देर पहले टीवी में देख रहा था जिसमें पाकिस्तान के किसी टीवी चैनल पर भारत द्वारा किये गए सर्जीकल स्ट्राइक पर चर्चा चल रही थी। टीवी चैनल के संवाददाता खुले में कह रहे थे कि भारत अगर दाऊद इब्राहिम को मारना चाहता है तो दाऊद पकिस्तान में नहीं हैं और रही बात "हाफ़िज़ सईद" की तो उनके फियादीन इतनी तादाद में हैं कि भारत की ओर से आने वाले किसी भी इंसान चाहे वो सैनिक हो या कोई भी शख़्स उसकी टाँगे तोड़ दी जायेगी, उसकी जान को भी ख़तरा होगा। अब मुझे समझ में ये नहीं आ रहा कि पाकिस्तान के समर्थन में वहाँ की जनता हैं भी या नहीं क्यों की वहाँ की बहुत बड़ी आबादी आज भी मूलभूत आवश्यकताओं से जूझ रही हैं। पेट में रोटी नहीं बात ज़ेहाद की, ये बात बड़ी बेमानी सी लगती हैं। पाकिस्तान के हुक्मरान उनकी जनता की मूलभूत आवश्यकताओं तक तो पहुँच नहीं पा रहे हैं और बात कर रहे भारत से कश्मीर को लेने की। अब कोई पाकिस्तान से ये पूछे की जो तुम्हारे पास हैं वो तुमसे संभाला नहीं जा रहा। तो कश्मीर लेने की ख़्वाहिश रखते हुए इसे भी भूखा नंगा बनाना चाहते हो। पाकिस्तान को ख़ुद की ज़मीन को चमन बनाने या ज़न्नत बना लेने पर मंथन करना चाहिये। पाकिस्तान की आवाम ने अग़र उनके ही मुल्क़ में बग़ावत का बिगुल एक स्वर में बजा दिया तो पाकिस्तान में गृह्क्रान्ति हो जायेगी और फ़िर कभी भी किसी भी मुल्क़ में आतंकवाद फैलाना तो दूर की बात पाकिस्तान आतंकवाद के बारे में सोच भी नहीं पायेगा। जय हिंद।
Monday, 15 August 2016
आज़ादी की एक भोर ऐसी भी होगी...
शरीर तो आज़ाद हो गये थे 1947 में
सोच आज भी इंतज़ार में हैं रिहाई के
विकार के सारे बादल छंट जायेंगे इक दिन
हर एक कोने में धूप छम से बिखर जायेगी
सारे भेद मिटा उस दिन हम इंसान बन जायेंगे
उस दिन सभी की थाली में रोटी होगी
किसी की भी आँखें नम ना होगी
जमीं पर प्रेम और वात्सल्य की बरखा होगी
आज़ादी की एक भोर ऐसी भी होगी
जाति, धर्म और मज़हब की आड़ में
ना किसी की कुटिया जलेगी
ना किसी की चिता सुलगेगी
ना कोई बेबस होके सूत भरेगा
ना ही कोई जीते जी रोज़ मरेगा
बहन बेटियाँ और बहुओं की
अस्मत तार तार ना होगी
सारा देश उनके घर सा होगा
और वो ख़ुद को महफूज़ समझेगी
आज़ादी की एक भोर ऐसी भी होगी
उस दिन जश्न ए आज़ादी सही मायनों में होगी !!!
#ManishSharma
Happy Independence Day
Sunday, 12 October 2014
जन्नत सिसक रहा है !!!
बाढ़ग्रस्त हैं गलियां सारी
विकट परिस्थितियाँ हुई हैं भारी
चीत्कार रहे हैं सारे कूचे
नम निगाहें इधर उधर
बस अपनों को ही ढूंढें
ग़म भारी है और दर्द हावी
हर ओर फैली भयावह त्रासदी
डल तबाह हो चुकी है
शिकरे सभी हुए तहस नहस
कोई तो देखो, कोई तो थामों
नम निगाहें मदद मांगे
उदास चेहरे भीतर झांके
कश्मीर (जन्नत) सिसक रहा है
अपने ज़ख्मों पर फफक रहा है
कश्मीर (जन्नत) सिसक रहा है
अपने ज़ख्मों पर फफक रहा है !!!
Poet : Manish Sharma
Sunday, 3 August 2014
दोस्त हो कोई...
यहाँ दोस्त तो
सभी है हमारे
दिल के क़रीब भी
होता कोई
लभों से कुछ ना
कहते उसे
नैनों की भाषा
समझता कोई
कुछ अपनी कहते
कुछ उसकी सुनते
बातें बेवजह यूँ ही
होती कोई
ख़ुशी में हँसते
ग़म में ग़मगीन होते
ऐसा कभी कहीं
अपना भी होता कोई
राज जो सीने में
दबे है हज़ारों
इन्हें जान पाता ऐसा
राजदार होता कोई
अब तक नहीं मिला
सच्चा दोस्त कोई
एक दिन जरूर मिलेगा
सच्चा प्यारा दोस्त कोई
Happy Friendship Day !!
Manish Sharma
Sunday, 24 November 2013
उठो और देश बुनो...
जब तुम
तुम ना होओगे
जब मैं
मैं ना हाऊँगां
तब तुम
मुझमें होओगे
और मैं
तुझमें हाऊँगां
टूटेंगी फिर
सब दीवारें
जो मुझको
मिट जाऐंगें
सब फ़ासले
जो तेरे मेरे
दरमयाँ रही
आओ मिलकर
हम देश बुने
आओ मिलकर
हम साथ चलें।















