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Sunday, 15 September 2013

स्वामी नरेन्द्र विवेकानन्द



हिन्दी दिवस के पखवाड़े का आज दूसरा दिन हैं जिसमें संस्कार भारती, बाड़मेर की ओर से आयोजित स्वामी विवेकानन्द सार्द्ध शति पर काव्य संगोष्ठी का आयोजन आज गांधी चौक विधालय, बाड़मेर के प्रागंण में किया गया, जिसमें  शहर के कई जाने माने कवियों और साहित्यकारों ने शिरकत की। स्वामी विवेकानन्द जी के व्यक्तित्व पर मेरे द्वारा लिखी कविता जिसका शीर्षक “स्वामी नरेन्द्र विवेकानन्द” को आज प्रस्तुत करने का अनुभव मेरे लिए अविस्मरणीय रहा। स्वामी जी को शब्दों में बयान कर पाना बेहद मुश्किल है, लेकिन मेरे लिए प्रसन्नता की बात ये रही कि प्रसिद्ध कवियों और साहित्यकारों की शोहबत में रहकर मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला और मेरे द्वारा कही कविता की कवियों और साहित्यकारों ने सराहना की। इस सराहना ने मेरे भीतर एक नई ऊर्जा का संचार सा कर दिया हैं और वरिष्ठ कवियों और साहित्यकारों द्वारा मिले इस प्यार के कारण मुझमें अच्छा कार्य करने का जज्बा भी जाग उठा। गुजरे दिन से मेरी शिथिलता आज कुछ कम थी, लेकिन मैं अपने आप को पूरी तरह से सहज महसूस नहीं कर पा रहा था लेकिन सहज होने का बार बार प्रयास ज़रूर कर रहा था। खैर इसी के साथ एक अच्छी काव्य संगोष्ठी का समापन हुआ पुरस्कार वितरण के साथ।

स्वामी नरेन्द्र विवेकानन्द


 जिनके मुख पर सदा ही रहता

वीर पुरूष सा तेज अलौकिक
 

जिनकी काया में बल रहता
 

इन्द्रदेव के वज्र के माफि़क

शांत चित्त और निर्मल वो थे
 

वाणी से रस माधुर्य था टपका
 
भाषण देते थे वो ऐसे
 

जैसे कोई शेर हो गरजा 

मन से थे वे दृढ़ संकल्पी
 

आत्मा से भाव विभोर
 

नैनों में थी चमक निराली
 

पुरूषार्थ से थे सराबोर
 

पूजा पाठ और ध्यान योग में
 

भक्ति उनकी पूरी थी
 

काम क्रोध और मोह माया से
 

मीलों उनकी दूरी थी
 

कर्मयोग का भेद सिखाकर
 

जग को दिया नया आधार
 

हिन्द प्रांत की गाथा गाकर
 

पश्चिम को दिये नये विचार
 

हिन्दी क्या है हिन्दू क्या है
 

अर्थ बताया ऐसे साधक
 

हिन्दी क्या है हिन्दू क्या है

थे भारतीय संस्कृति के प्रचारक

जग जाने हैं स्वामी उनको
 

माँ के थे वो नरेन्द्रनाथ
 

छवि थी उनकी बड़ी ही अद्भुत

सादा जीवन उच्च विचार

उनके पदचिन्हों पर चलना  
 

चाहे भारत माँ का लाल
 

यी दिशा दी है  "मन" को
 

हो साकार भारत माँ का ख्वाब
 
आत्मसात कर लिया हैं जिको
 

नाम जपे हर कंठ
 

आदर्श हैं और वो ही रहेंगें
 

स्वामी विवेकानन्द !!


Saturday, 14 September 2013

शिथिल मन



आज हिन्दी दिवस के अवसर पर हमारे शहर बाड़मेर में एक काव्य संगोष्ठी का आयोजन हुआ, जिसमें मुझे भी शामिल होने का अवसर प्राप्त हुआ, बहुत ही मंझे हुए कवि और साहित्यकार थे इस संगोष्ठी में। एक श्रोता बनकर तो मैंने कवियों से कविताऐं कई बार सुनी पर एक कवि का कविता कहने का अहसास क्या होता है वो मैंने आज पहली बार महसूस किया।

कविता पठन से पहले की शिथिलता और मन में उत्पात एक विचित्र सी स्थिति होती है हालाँ कि मैं इससे पहले कई बार किसी ना किसी प्रकार के विषयों पर अभिव्यक्ति देने के लिए मंच पर जा चुका था लेकिन ये सत्य हैं कि हर एक जगह का अपना एक अलग ही दबाव होता हैं और यहाँ में खुद को कुछ ऐसे ही दबाव के तले दबा महसूस कर रहा था।

सभी लोगो का ध्यान भी मुझ पर केन्द्रित हो गया था और मेरी दशा बिल्कुल वैसी थी जैसा कि एक नए प्रेमी की होती हैं जो अपनी प्रेमिका को प्रेम का इज़हार करने से पहले अपने मन को ना जाने कितनी बार समझाता होगा पर “मन” मन भला कहाँ समझ पाता है, संगोष्ठी के आरम्भ से लेकर अन्त तक कविताओं के रस से माहौल सराबोर रहा।


एक अच्छे अनुभव के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ जिसमें सभी कवियों को पुरस्कृत कर सम्मानित किया गया। शुक्रिया अदा करता हूँ मैं उस रब का और उन लोगों का जिन्होनें मुझे मंजि़ल की और अग्रसर होने का फलसफ़ा सिखाया।

Sunday, 17 March 2013

मेरी जिंदगी मेरे नियम


मैं मेरी जिंदगी मेरे मुताबिख जीना चाहता हूँ, और ये भी ख्याल रखना चाहता हूँ कि मेरी वजह से किसी कि भावनाऐं आहत ना हो, पर शायद ये मुमकिन नहीं क्यों कि आग और पानी भला एक दूसरे के मित्र कैसे बन सकते हैं, मुझ पर पाश्चात्य संस्कृति की गहरी छाप हैं पर शायद ये मेरी संस्कृति वाले लोगों को बरदाश्त नहीं, इन्हें शायद पाश्चात्य संस्कृति में अश्लीलता नज़र आती हैं पर मेरी नज़र में अश्लीलता देखने वाले की नज़रो में होती हैं ना कि संस्कृति में। पाश्चात्य संस्कृति वाले लोग कम से कम जैसे हैं वैसे दिखाई तो देते हैं हम लोग दोहरी जिंदगी जीते हैं, मन में तो अश्लीलता भरे हुए हैं और चेहरे पर सात्विक नकाब लगाऐ घूम रहे हैं, मैं जानता हूँ मेरे इन लव्जों की वज़ह से मेरी छवि उन लोगों में बहुत खराब हो जाएगी जो मेरी बात से सरोकार नहीं रखते पर जैसा कि मैंने कहा ‘‘मैं मेरी जिंदगी मेरे मुताबिख जीना चाहता हूँ‘‘ तो क्यों ना मैं  जीने का प्रयास बड़ी शिद्दत से करूँ.........

Saturday, 2 March 2013

"तानाशाह सम़ाज़, बेबस इंसान"



अग़र मैं सब कुछ सम़ाज़ के मुताबिख करता हूँ तो मैं एक समाज़िक प्राणी हूँ अगर मैंने सम़ाज़ के खिलाफ़ ग़लत को ग़लत और सही को सही कहने का प्रयास किया या फ़िर अपनी ज़िदगीं को अपने सिद्धातों के अनुसार जीने का प्रयास किया तो मैं (समाज़िक प्राणी) सम़ाज़ से बाहर। कभी-कभी मैं सोचता हूँ कि क्या, मैं इसी सम़ाज़ का अंश हूँ जो मेरी हर खुशी में शरीक़ हैं, लेकिन ग़म़गीन अवस्था में क्यों मैं खुद तन्हा ही पाता हूँ कहाँ चला जाता हैं सम़ाज़ उस वक्त, जब़ मुझे सम़ाज़ की सबसे ज्यादा आवश्यकता होती हैं, ढकोसला लग़ता हैं मुझे ये सम़ाज़ और इसके नियम, जब सम़ाज़ को मेरी परवाह नहीं तो मुझे भला क्यों परवाह हो इस सम़ाज़़ की।

Monday, 25 February 2013

मैं कायर हूँ




मैं कायर हूँ, बुज्ज़दिल हूँ

मैं वो बनने का प्रयास कर रहा हूँ

जो मैं नहीं हूँ

झूठी मुस्कान लिए

नकली नकाब़ पहने

मैं उन लोगों की हाँ में हाँ भर रहा हूँ

जो इस काबिल नहीं

मैं उन लोगों की जी हूज़ूरी कर रहा हूँ

जो इस लायक नहीं

मुझे ये करना होगा

क्यों कि मेरे पास

इसके सिवा कोई चारा नहीं

क्यों कि मुझमें बगावत

करने की ताकत नहीं....

Sunday, 24 February 2013

बेबस निग़ाहें



मैं किस खुशी की बात करूँ

जब कि ग़म तो, हर बहाने से हैं

तुम्हें होगी फ़िकर जहाँ भर की

उसके पास इतना

उसके पास  उतना

मुझे नहीं चाहिए, शान ओ शौकत

मुझे नहीं चाहिए, नाम ओ शोहरत

मेरी बेबस निग़ाहें तरस रही

दो जून की रोटी को

मेरी खामोशियाँ हैं पुकार रही

सिर्फ एक लंगोटी को

जिस्म से आह निकल रही

सांसें मेरी उखड़ रही

तुम परवाह करो तुम्हारी

मेरा क्या, मैं ऐसे ही जी लूंगा

ना जी सका, तो थोडा़-थोडा़ मर लूंगा

तुम्हारे लिए बेफ़िजूल हैं

मेरी ये सारी कहानी

तुम परवाह करो

सिर्फ तुम्हारी

मैं  जी लूंगा

ना जी सका

तो थोडा़-थोडा़ मर लूंगा...

Tuesday, 12 February 2013

मैं तुम नहीं



मैं वो नहीं बनना चाहती, जो तुम हो

मैं वो नहीं होना चाहती, जो तुम हो

मैं तुम हो गयी तो मैं, मैं नहीं रहूंगी

मैं थम गयी, तो फिर कभी नहीं बहूँगी

मेरा वजूद तुम नहीं हो

मेरी पहचान तुम नहीं हो

मेरे जीने की वज़ह तुम नहीं हो

मेरे हँसने का सबब तुम नहीं हो

मेरे अल्फाज़ तुम नहीं हो

मेरी परवाज़ भी तुम नहीं हो

तुमने मुझे क्या समझा

भोग विलास का साधन

तुमसे मुझे क्या हासिल

ग़म, दर्द, यातना

मैं सदियों से सहती रही हूँ

क्या अब भी सहूँ

मैं बरसों से खमोश रही हूँ

क्या अब भी चुप रहूँ....?





Monday, 7 January 2013

‘‘हार गई ज़िदगीं‘‘



दोस्तों !                                                                                                                                                      

               दिल्ली में 16 दिसम्बर 2012 को घटित 23 वर्षीय छात्रा के साथ हुई बलात्कार की घटना को मैने अपने शब्दों को एक कविता के रूप में व्यक्त करने का प्रयास किया हैं उम्मीद रखता हूँ कि आप लोग इसे कविता ना समझकर के एक ऐसा आहृवान समझेगें जिसमें हम सभी मिलकर के यह प्रण करें कि समाज में फ़िर से कभी भी बलात्कार जैसा घिनौना कृत्य दोबारा ना हो पाये।



जीवन जीना चाहती हूँ मैं

सारी खुशियाँ

अपनी झोली में समेट के

दुनिया देखना चाहती हूँ मैं

पिया संग ब्याह रचा

डोली में बैठ के

कुछ ख्वाब हैं मेरे कुछ अरमां भी

कुछ हया हैं मुझमें कुछ लाज भी

हंसती हूँ खेलती हूँ गुनगुनाती हूँ

कभी-कभी होती हूँ गमग़ीन

तो भी मुस्करा लेती हूँ

बेहद खूबसूरत था अतीत मेरा

कल्पना हैं उम्दा होगा भविष्य भी

मगर क्या अपने क्या बेगाने

हर एक नजर हैं हवस भरी

मैं इंसानों के शहर में सुरक्षित नहीं

तो किस शहर में घर बसाऊँ

मेरे सव्वालों का जवाब

किसी के पास नहीं

कोई तो बताओ

कोई तो सुझाओ

अब मैं कहाँ जाऊँ

सुना था हसरतें

कभी पूरी नहीं होती

पर आज यकीन भी हो रहा हैं

सुना था वक्त

सदा एक सा नहीं रहता

पर आज महसूस भी हो रहा हैं

आज एक भयकंर तूफाँ आया हैं

मझधार में भगवान ने मुझे फँसाया हैं

मैने गौर से देखा तो मेरे सामने

जालिम, वैहशी, हैवान, दरिंदे थे

एक नहीं, दो नहीं, तीन नहीं

वो पूरे के पूरे छः थे

मैं बहुत गिड़गिड़ाई

की लाख दुहाई

पर किसी ने मेरी

एक ना मानी

मिलकर सभी ने बारी-बारी

तार-तार कर दी मेरी अस्मत

मैं स्तब्ध थी लहू से लथपथ

फेंक दिया जालिमों ने

मुझे र्निवस्त्र कर पथ पर

राहगीरों की निगाह

मुझे घूरती रही

पर मदद को हाथ

किसी के ना उठे

अब मैं दोष मढूँ

तो किस पर

समाज़ पर, भगवान पर

या फिर अपनी

किस्मत पर

आज ये मेरे साथ

कल कोई और होगा

पर किसी को नहीं हैं जुर्म से गिला

चलता आ रहा हैं और चलता रहेगा

क्या सदैव ये सिलसिला

मेरा जीवन-मृत्यु संघर्ष जारी हैं

क्यों कि मैं जीवन जीना चाहती हूँ

मै बलात्कारियों के खिलाफ

सख्त कानून की इच्छा रखती हूँ

जो मैंने सहा वो कोई और ना सहे

भगवान से बस यहीं कामना रखती हूँ

मगर जीवन-मृत्यु संघर्ष में

आखिर मृत्यु विजयी रही

हार गई जिदंगी

हार गई जिदंगी!!
                         अलविदा!
                                         


Thursday, 4 October 2012

प्रेम का आइना



तुम क़रीब होती हो, तो तुमको दूर पाता हूँ

जब तुम दूर होती हो, तो तुमको करीब पाता हूँ

दिन भर भटकता हूँ, रातों को जागता हूँ

अक्सर तन्हाई में खुद से, बातें किया करता हूँ

कुछ सोचता हूँ, पर बयाँ नहीं कर पाता

कुछ चाहता हूँ पर जता नहीं पाता

अजीब सी उलझन हैं, अज़ीब सी तड़पन

अजीब सी बेचैनी हैं, और अजीब सी सिहरन

तुमको पाने का, जश्न हैं दिल में

एक त्यौंहार सा, हर पल हैं मन में

शायद तुम कभी, समझ ना पाओ

ये हाल ए दिल मेरा

शायद तुम कभी, जान ना पाओ

ये जूनूँ ए जज्बा मेरा

कितनी शिद्दत से, मोहब्बत हैं मुझे तुमसे

बड़ी मुद्दतों से, तुम्हें पाने की हसरत थी मुझे

कहने को बहुत कुछ हैं, इस दिल में

जो बरसों से, सम्भाल कर के रखा हैं

लव्ज़ मिले, तो माला बना कर पिरो दिया शब्दों को

क्यों कि तुमने ही तो, संवारा हैं मेरे जीवन को

बिन पंख उड़ रहे थे, इस जहाँ में

तुम्हीं तो पंख दिये हो

बिन प्रवाह बह रहे थे, इस नदी में

तुम्हीं तो प्रवाह दिये हो

तुम्हारा ख्याल, तुम्हारी परवाह

अब हैं दिन रात मुझे

तुम्हारी इबादत, तुम्हारा सजदा

अब तुम बिन कुछ ना सूझे मुझे

अब तुम बिन कुछ ना सूझे मुझे........
                                                                    

 

                                 

                                                                 Image courtesy  :  M F Hussain